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    उत्तराखंड में आज भी चिह्नीकरण की बाट जोह रहे राज्य आंदोलनकारी, आखिर कब खत्म होगा इंतजार

    By Raksha PanthriEdited By:
    Updated: Fri, 02 Jul 2021 05:25 PM (IST)

    उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान सड़कों पर संघर्ष करने वाले राज्य आंदोलनकारी आज भी चिह्नीकरण की बाट जोह रहे हैं। बीते छह वर्षों से इनके चिह्नीकरण के संबंध में कोई भी बैठक नहीं हो पाई है। उत्तर प्रदेश के समय अलग उत्तराखंड राज्य के लिए लाखों लोग सड़कों पर थे।

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    उत्तराखंड में आज भी चिह्नीकरण की बाट जोह रहे राज्य आंदोलनकारी।

    विकास गुसाईं, देहरादून। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान सड़कों पर संघर्ष करने वाले राज्य आंदोलनकारी आज भी चिह्नीकरण की बाट जोह रहे हैं। बीते छह वर्षों से इनके चिह्नीकरण के संबंध में कोई भी बैठक नहीं हो पाई है। उत्तर प्रदेश के समय अलग उत्तराखंड राज्य के लिए लाखों लोग सड़कों पर थे। राज्य गठन के बाद सरकार ने राज्य आंदोलनकारियों को चिह्नित करने का निर्णय लिया। इसके लिए आवेदन आमंत्रित किए और जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति बनाई गई। चिह्नीकरण के लिए जेल में रहने, अस्पताल में इलाज कराने के रिकार्ड अथवा अखबारों की कटिंग को आधार बनाया गया। आंदोलनकारियों का चिह्निीकरण भी हुआ, मगर बड़ी संख्या में आज भी आंदोलनकारी चिह्नित नहीं हो पाए हैं। स्थिति यह है कि जिलाधिकारी कार्यालयों में आवेदनों की भरमार है। जिला स्तर से कई बार शासन से इस संबंध में दिशा-निर्देश मांगे जा चुके हैं। बावजूद इसके सबने इस पर चुप्पी सी साध ली है।

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    तीसरे डाप्लर राडार को अभी इंतजार

    आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील उत्तराखंड में मौसम के पूर्वानुमान की सटीक जानकारी देने के लिए अभी गढ़वाल मंडल में डाप्लर राडार स्थापित नहीं किए जा सके हैं। मसूरी के निकट सुरकंडा और लैंसडौन में डाप्लर राडार लगाने का काम नहीं हो पाया है। सुरकंडा में अभी कुछ वक्त की दरकार है, तो लैंसडौन में जमीन तक का चयन नहीं हो पाया है। दरअसल, प्रदेश में वर्ष 2013 के बाद आई आपदा को देखते हुए यहां दो डाप्लर राडार लगाने का निर्णय लिया गया। मुक्तेश्वर के राडार की जद में पूरा कुमाऊ मंडल है। वहीं सुरकंडा के राडार के दायरे में केवल गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ धाम आ रहे हैं। ऐसे में एक अन्य डाप्लर राडार लैंसडौन में लगाने का निर्णय हुआ। इसके दायरे में पौड़ी, चमोली और बदरीनाथ धाम आ जाएंगे। आपदा की दृष्टि से गढ़वाल अधिक संवेदनशील है, लेकिन फिर भी इसमें लगातार विलंब हो रहा है।

    कागजों से बाहर नहीं निकली घोषणा

    उत्तराखंड का नैसर्गिक सौंदर्य बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां कई खूबसूरत स्थान अब भी ऐसे हैं, जो पर्यटन गतिविधियों से दूर हैं। इन स्थानों को पर्यटन के मानचित्र पर लाने के लिए कई घोषणाएं तो हुई लेकिन कागजों से बाहर नहीं निकल पाईं। ऐसी ही एक घोषणा है पौड़ी-लैंसडौन-खिर्सू पर्यटन सर्किट योजना। वर्ष 2006 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पर्यटन विकास के मद्देनजर इस सर्किट की घोषणा की। कहा गया कि इससे प्रदेश को राजस्व मिलने के साथ ही स्थानीय निवासियों को रोजगार भी मिलेगा। तकरीबन नौ साल तक यह घोषणा बिसरा दी गई। वर्ष 2015 में कांग्रेस सरकार आई तो इसमें कण्वाश्रम क्षेत्र को शामिल करते हुए पर्यटन सर्किट बनाने की बात कही गई। ये घोषणा भी कागजों पर ही है। अब मौजूदा सरकार ने भी इस सर्किट को बनाने की बात कही है, मगर धरातल पर अभी भी कोई काम नहीं हुआ है।

    मसूरी रोपवे के संचालन पर नजर

    पहाड़ों की रानी मसूरी की पहचान पूरे देश के अलावा विदेश में भी है। उत्तराखंड आने वाले पर्यटक एक बार मसूरी की ओर जरूर रुख करना चाहते हैं। सीजन में यहां इतनी भीड़ होती है कि देहरादून से मसूरी के बीच सड़कों पर जाम रहता है। पर्यटकों को जाम से निजात दिलाने और सफर का रोमांच बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार ने 2015 में देहरादून से मसूरी तक रोपवे निर्माण करने का निर्णय लिया। वर्ष 2017 में इसकी स्वीकृति की बात कही गई। वर्ष 2019 में इसे केंद्र से स्वीकृति भी मिल गई। इसके लिए बाकायदा कंपनी का भी चयन किया गया। कहा गया कि इस पर जल्द काम शुरू हो जाएगा। निर्माण कार्य शुरू होता, इससे पहले पर्यावरणीय स्वीकृति और भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस की अनुमति का पेच फंस गया। अब आइटीबीपी ने इस पर स्वीकृति दे दी है, मगर अभी पर्यावरणीय स्वीकृति का इंतजार किया जा रहा है।

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