देहरादून, रविंद्र बड़थ्‍वाल। सरकारी मशीनरी की खास अदा है। काम कराने की कला आनी चाहिए, फिर चाहे कितना भी कठिन काम हो, बंदे उसकी तोड़ ढूंढ निकालते हैं। लॉकडाउन-एक लागू हुआ तो सिर्फ यही समझाया गया कि जान बचानी है। इसलिए पूरा फोकस सरकारी स्कूल-कॉलेज बंद रखने पर रहा। कर्णधारों के भविष्य पर ताले न लटक जाएं, यह शोर उठा। लंबी चुप्पी। बाद में लॉकडाउन-टू की बारी आई। इस बार जान के साथ जहान का ख्याल रखने को कहा गया। कमाल देखिए, ऑनलाइन पढ़ाई करने-कराने के तरीके से आगे लाकर तरकीब ढूंढी गई। अब दूरदर्शन उत्तराखंड बोर्ड के लाखों बच्चों को पढ़ाएगा। हर रोज तीन कक्षाएं। सभी कठिन विषयों की सीडी तैयार की गई हैं। राज्य के माध्यमिक विद्यालयों में 11,67831 छात्र हैं। इनमें सरकारी और सहायताप्राप्त विद्यालयों में करीब 5.89 लाख हैं। न कनेक्टिविटी और न ही स्मार्ट फोन या लैपटॉप का झंझट। ईडियट बॉक्स की दस्तक ज्यादातर घरों तक है ही।

निर्मल गंगा, नया संकल्‍प

पर्यावरण और नदियों की स्वच्छता ख्वाब सरीखे लगते रहे हैं। कोरोना से बचने की जंग में लॉकडाउन लगते ही यह स्पष्ट हो गया है कि अगर शिद्दत से चाहा जाए तो ये ख्वाब हकीकत बन सकते हैं। आम मन के भीतर चल रही इस कुलबुलाहट का फायदा केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय ने उठाया। पतित पावनी और जीवनदायिनी गंगा को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने को छेड़ी गई नमामि गंगे मुहिम के तहत मंत्रलय ने ऑनलाइन क्विज शुरू की। इसमें बारहवीं तक के स्कूली बच्चों ने तीन समूह में हिस्सा लिया। युवा और वरिष्ठजनों को भी शामिल होने का मौका दिया गया। गंगा के धार्मिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक महत्व, भौगोलिक स्थिति समेत तमाम विषयों को सवालों के दायरे में रखा गया। उधर टीवी पर जब रामायण और महाभारत का प्रसारण चल रहा हो, ऐसे में ऑनलाइन क्विज के बहाने गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए आम आदमी के संकल्प को नई धार दी गई।

संवदेना से जुड़ी तकनीक 

कोरोना महामारी ने भले ही स्कूलों में ताले डाल दिए, लेकिन डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने संकट की इस घड़ी में एक नई राह भी सुझा दी है। छात्र, शिक्षक और स्कूल के बीच खालीपन को तकनीक ने न सिर्फ भरा, बल्कि संवेदनाओं की नई इबारत भी लिखी जा रही है। घरों में कैद होकर रह गए भविष्य को संवारने के लिए गुरुजन नए हौसलों के साथ मुस्तैद हैं। स्कूलों से लेकर डिग्री कॉलेजों तक सरकारी शिक्षक ऑनलाइन पढ़ाने के साथ वीडियो क्लिप तैयार कर यू-ट्यूब पर अपलोड कर रहे हैं। वहाट्सएप पर छात्रों को भेज भी रहे हैं। तकनीक ने ये जो नया रिश्ता जोड़ा है, इसने भविष्य में रेमेडियल टीचिंग यानी कमजोर बच्चों को पढ़ाने के लिए अतिरिक्त कक्षाओं के नए विकल्प को तैयार कर दिया। शासन के आला अधिकारी इसे सरकारी शिक्षा को पटरी पर लाने की नई उम्मीद के रूप में देखने लगे हैं।

किताबों को मिलेगी मंजिल

ऑनलाइन पढ़ाई की कवायद के बीच सरकारी व सहायताप्राप्त स्कूलों के एक से आठवीं के 6.92 लाख और छठवीं से 12वीं के 5.89 लाख छात्रों तक नई किताबें पहुंचाने की चुनौती है। नया सत्र शुरू होने से पहले ही लॉकडाउन लागू। बड़ी संख्या में छात्र नई कक्षाओं की किताबें खरीदने से वंचित हैं। राहत ये है कि केंद्रीय गृह मंत्रलय ने किताबों की दुकानों को खोलने को हरी झंडी दिखा दी है।

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शहरी क्षेत्रों में रहने वाले सरकारी और निजी स्कूलों के छात्रों की परेशानी का समाधान होना तय हो गया है। सवाल ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों का है। उन तक किताबें पहुंचाने की बात उठी तो शिक्षा व पंचायतीराज मंत्री अरविंद पांडे ने कारगर फामरूला सुझाया। खंड शिक्षा अधिकारी व स्कूलों के प्रधानाचार्य त्रिस्तरीय पंचायतों के कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों की मदद से गांव-गांव में छात्रों तक किताबें पहुंचाएंगे। यह काम शारीरिक दूरी के मानकों के मुताबिक अंजाम दिया जाएगा।

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Posted By: Raksha Panthari

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