यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 31, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
उत्तराखंड में गौरेया को लेकर सामने आएगी असल तस्वीर
पक्षी विविधता के मामले में प्रसिद्ध उत्तराखंड में गौरैया (स्पेरौ) की स्थिति क्या है किन क्षेत्रों में इस पक्षी प्रजाति ...और पढ़ें

केदार दत्त, देहरादून : पक्षी विविधता के मामले में प्रसिद्ध उत्तराखंड में गौरैया (स्पेरौ) की स्थिति क्या है, किन क्षेत्रों में इस पक्षी प्रजाति में कमी देखी गई और कहां अधिकता है, इनकी संख्या में कमी के क्या कारण हैं, ऐसे सवालों से जल्द ही पर्दा हट जाएगा। वन विभाग ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) और बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) के माध्यम से सर्वे कराने का निश्चय किया है। प्रतिकरात्मक वन रोपण निधि एवं प्रबंधन योजना प्राधिकरण (कैंपा) से इसके लिए 50 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई है।
सर्वे के सिलसिले में जल्द ही डब्ल्यूआइआइ, बीएनएचएस व वन विभाग के मध्य एमओयू पर साइन होगा।विषम भूगोल और 71.05 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड की पक्षी विविधता बेजोड़ है। देशभर में पाई जाने वाली परिंदों की करीब 1300 प्रजातियों में से करीब 700 यहां पाई जाती हैं। बावजूद इसके देश के अन्य हिस्सों की भांति उत्तराखंड में भी गौरैया की संख्या में बेहद कमी देखी गई है। खासकर, शहरी क्षेत्रों में इसकी संख्या में भारी गिरावट देखी गई है। हालांकि, कोरोनाकाल में लाकडाउन के दौरान इस खूबसूरत पक्षी की चहचहाहट घरों में सुनाई देने लगी थी, मगर अब स्थिति फिर पहले जैसी हो चली है। इस सबको देखते हुए वन महकमे ने गौरैया की वास्तविक स्थिति और इसकी संख्या में कमी के कारणों की गहनता से पड़ताल कराने का निर्णय लिया है।
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राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जेएस सुहाग के अनुसार गौरैया संरक्षण के लिए चालू वित्तीय वर्ष में कैंपा से 50 लाख की राशि मंजूर हुई है। उन्होंने बताया कि गौरैया संरक्षण के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इसकी संख्या में कमी की वजह क्या है, राज्य के किन क्षेत्रों में इसकी संख्या घटी है और कहां अधिकता है, कहीं प्रदूषण अथवा कीटनाशकों के कारण तो इस पक्षी प्रजाति पर संकट तो नहीं आया है, ऐसे तमाम बिंदुओं को लेकर डब्ल्यूआइआइ व बीएनएचएस के सहयोग से सर्वे कराया जाएगा।
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उधर, बीएनएचएस के निदेशक डा.विभाष पांडव ने बताया कि जल्द ही डब्ल्यूआइआइ, बीएनएचएस व वन विभाग के मध्य एमओयू पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इसके बाद डब्ल्यूआइआइ व बीएनएचएस के पक्षी विशेषज्ञों की टीम राज्य में सर्वेक्षण में जुट जाएगी।
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