देहरादून, जेएनएन।  Handloom Day हथकरघा उद्योग यानी हाथों का हुनर उत्तराखंड के हजारों परिवारों का जीवन स्तर सुधारने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में सहायक साबित हो रहा है। उत्तराखंड हथकरघा एवं हस्तशिल्प विकास परिषद के अनुसार 31 मार्च तक प्रदेश के 11 हजार 96 परिवार हथकरघा उद्योग से जुड़े थे। इनमें सबसे अधिक आठ हजार 717 परिवार ऊधमसिंह नगर जिले के हैं, जबकि टिहरी से सबसे कम 48 परिवार इस विधा से जुड़े हैं। राज्य में हस्तशिल्प और हथकरघा का सालाना कारोबार तकरीबन 50 करोड़ रुपये का है।

हाथ से बुनाई की परंपरा उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के सबसे समृद्ध व सशक्त पहलुओं में से एक है। एक वक्त था, जब उत्तराखंड के अधिकांश परिवार हथकरघा उद्योग से जुड़े हुए थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षो में युवा पीढ़ी का इस विधा से मोह भंग हुआ है। हालांकि, राज्य सरकार ने पिछले चार साल में ग्रामीणों को हथकरघा उद्योग से जोड़ने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। जिनका सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहा है। ग्रामीण फिर इस उद्योग जुड़ने लगे हैं। प्रदेश के बुनकरों को स्वावलंबी बनाने और हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार खुद बुनकरों से उनके उत्पाद खरीद रही है। जिन्हें ‘हिमाद्रि’ के नाम से देश-विदेश में उपलब्ध कराया जा रहा है।

इन उत्पादों की भारी मांग

राज्य के हथकरघा उत्पादों की देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी विशेष पहचान है। यहां की बनी रिंगाल की टोकरी, कंडी, भेड़ की ऊन से बनी शॉल, पंखी, दुपट्टा, जूट से बने कारपेट, भीमल के नेचुरल फाइबर से बने विभिन्न प्रकार के उत्पादों की भारी मांग है।

200 महिलाओं को रोजगार देकर किया सशक्त

राज्य में हथकरघा उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए उद्योग निदेशालय ने वर्ष 2018 में नंदा देवी सोसायटी व हंस फाउंडेशन के गठजोड़ से अल्मोड़ा में नंदा देवी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का गठन किया था। इसकी मदद से अल्मोड़ा में 200 महिला बुनकरों को रोजगार मिला हुआ है, जो कोरोनाकाल में भी घरों में हथकरघा कार्यो से जुड़ी रहीं।

स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा है इतिहास

देश में सात अगस्त 1905 को स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ था। इसी को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सात अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाने की शुरुआत की। इस अवसर पर आज पटेलनगर स्थित उद्योग निदेशालय राष्ट्रीय वेबिनार के माध्यम से अल्मोड़ा, ऊधमसिंह नगर और देहरादून के बुनकरों से संवाद स्थापित करेगा।

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हर वर्ष दिया जाता है शिल्प रत्न पुरस्कार

उद्योग निदेशक एससी नौटियाल ने बताया कि राज्य में परंपरागत शिल्प कला के संरक्षण, संवर्धन और प्रोत्साहन को भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। शिल्पियों की कल्पनाशीलता, योग्यता व कारीगरी को प्रोत्साहित करने के लिए प्रत्येक वर्ष एक उत्कृष्ट शिल्पी को राज्य सरकार की ओर से एक लाख रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाता है।

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