मोहब्बेवाला हादसा: अन्य राज्यों में जब हुए ऐसे हादसे, कहीं NHAI-PWD के प्रोजेक्ट डायरेक्टर पर FIR, कहीं इंजीनियर गिरफ्तार
मोहब्बेवाला में लगातार हो रहे सड़क हादसों और मौतों के बाद पुलिस ने एनएचएआई और लोक निर्माण विभाग के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।

मोहब्बेवाला हादसा। फाइल फोटो

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
राज्य ब्यूरो, देहरादून। मोहब्बेवाला में 15 हादसों और कई मौतों के बाद अब कारवाई का शिकंजा एनएचएआइ और लोक निर्माण विभाग तक पहुंच गया है। पुलिस ने दोनों विभागों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। पुलिस के नोटिस और बार-बार चेताने के बाद भी इन दोनों विभागों ने समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया।
मोहब्बेवाला में सड़क हादसों का सिलसिला अचानक हुई समस्या नहीं है। नवंबर 2024 से यहां पर दुर्घटनाएं हो रही हैं। भारी वाहन बार-बार अनियंत्रित हो रहे हैं। मौतें हो रही हैं। पुलिस चेतावनी दे रही है। एनएचएआइ को नोटिस भेजे गए। तकनीकी सर्वे और निरीक्षण भी हो रहे हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात।
हादसे के बाद कुछ दिन सक्रियता दिखती है और फिर व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। सवाल है कि आखिर सड़क की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संभाल रहे अफसर कब जवाबदेह होंगे? क्या हर दुर्घटना के बाद सिर्फ वाहन चालक को जिम्मेदार ठहराकर विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है?
मोहब्बेवाला में इस वर्ष 15 हादसों में छह लोगों की मौत हो चुकी है। 20 सितंबर के बाद तो दुर्घटनाओं ने और भयावह रूप ले लिया। इस अवधि में सात हादसों में पांच लोगों की जान चली गई। इतनी मौतों के बाद भी यदि दुर्घटनाओं की आशंका वाले स्थान पर स्थायी सुरक्षा इंतजाम नहीं हो पाते तो यह महज संयोग नहीं, बल्कि व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल है। आखिर कितनी मौतों के बाद विभागों की नींद टूटेगी? क्या किसी बड़े हादसे के इंतजार में सुरक्षा इंतजाम दुरुस्त किए जाएंगे?
पुलिस ने चेताया, नोटिस भेजा, फिर भी नहीं चेते
20 सितंबर को ट्रक हादसे में एक व्यक्ति की मौत और दो लोगों के घायल होने के बाद दून पुलिस ने एनएचएआइ को नोटिस भेजा। तीन दिन में जवाब मांगा गया कि दुर्घटनाएं रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए और आगे क्या कार्ययोजना है। यह कोई सामान्य चेतावनी नहीं थी।
पुलिस ने दुर्घटनाओं की गंभीरता को देखते हुए विभाग को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाई थी। इसके बावजूद हादसों का सिलसिला नहीं थमा। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि नोटिस के बाद विभाग ने वास्तव में क्या किया? क्या कार्ययोजना सिर्फ कागजों में बनी या मौके पर भी कोई प्रभावी बदलाव हुआ?
सर्वे पर सर्वे, समाधान कहां?
डाट काली टनल से मोहब्बेवाला के बीच दुर्घटनाओं के कारण जानने के लिए केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) की मदद ली गई। परिवहन विभाग ने भी तकनीकी सर्वे कराया। चेतावनी बोर्ड लगाए गए, गति सीमा के संकेतक और जिग-जैग बैरियर लगाए गए। लेकिन लगातार हादसे इन उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
जब एक ही स्थान पर बार-बार दुर्घटनाएं हो रही हैं तो क्या केवल बोर्ड और बैरियर लगाना पर्याप्त है? क्या सड़क की ढलान, डिजाइन, दृश्यता और भारी वाहनों की गति का वैज्ञानिक परीक्षण कर स्थायी सुधार किया गया? यदि नहीं, तो सर्वे और निरीक्षण का आखिर हासिल क्या रहा?
दूसरे राज्यों ने भी कराये अफसरों पर मुकदमे
सड़क की खामी से मौत होने पर सिर्फ वाहन चालक नहीं, संबंधित विभागों के अधिकारी भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। देश में इसके उदाहरण मौजूद हैं।
कर्नाटक के बेंगलुरु में 2023 में सड़क पर पर्याप्त रोशनी नहीं होने से मजदूर की मौत के मामले में एनएचएआइ के प्रोजेक्ट डायरेक्टर दिनेश कुमार और सुपरवाइजर हरिबाबू के खिलाफ आईपीसी की धारा 304ए में मुकदमा दर्ज किया गया। स्थानीय लोगों ने पहले भी हाईमास्ट लाइट लगाने की मांग की थी, लेकिन व्यवस्था नहीं हुई।
गुजरात के सूरत में 2019 में राष्ट्रीय राजमार्ग पर गड्ढे के कारण बाइक सवार की मौत के बाद एनएचएआइ अधिकारियों, ठेकेदार और ट्रक चालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। आईपीसी की धारा 304ए और 279 लगाई गईं।
उत्तर प्रदेश के बिजनौर में काशीपुर-हरिद्वार हाईवे पर रेलिंग और चेतावनी बोर्ड नहीं होने के आरोप के बीच नहर में गिरकर दो कांवड़ियों की मौत हुई। इस मामले में एनएचएआइ के प्रोजेक्ट डायरेक्टर मोहम्मद सरफराजुर रहमान और मैनेजर अमित शर्मा समेत संबंधित लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 125 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।
केरल के कोच्चि में निर्माणाधीन पुल पर सुरक्षा इंतजामों की कमी से बाइक सवार की मौत के बाद पीडब्ल्यूडी के चार अधिकारियों को निलंबित किया गया। असिस्टेंट इंजीनियर और ओवरसीयर समेत अधिकारियों तथा ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई हुई। आईपीसी की धारा 304ए और 336 के तहत मामला दर्ज किया गया।
महाराष्ट्र में गिरफ्तार भी किये गए अफसर
मुंबई-गोवा हाईवे पर इंदापुर से वडपाले के बीच वर्ष 2020 से संबंधित अवधि में 170 हादसों में 97 लोगों की मौत और 208 लोगों के घायल होने का आंकड़ा सामने आया। सड़क निर्माण और सुरक्षा इंतजामों में कथित खामियों को लेकर निर्माण कंपनी के प्रबंध निदेशक, जनरल मैनेजर और प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटिंग इंजीनियर समेत अधिकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई। प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटिंग इंजीनियर को गिरफ्तार किया गया।
जिम्मेदारों से सवाल
- मोहब्बेवाला में नवंबर 2024 से लगातार हादसे हो रहे हैं। क्या विभाग ने इस स्थान को ब्लैक स्पॉट घोषित किया है?
- एक ही स्थान पर बार-बार दुर्घटनाओं के बावजूद क्या विभाग ने विस्तृत सड़क सुरक्षा आडिट कराया? क्या खामियां दूर की गयीं?
- 20 सितंबर को एक व्यक्ति की मौत के बाद दून पुलिस ने एनएचएआई को नोटिस भेजकर तीन दिन में जवाब मांगा था। एनएचएआई ने क्या जवाब दिया? नोटिस के बाद कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए?
- क्या विभाग ने सड़क की ढलान, डिजाइन, मोड़, दृश्यता और भारी वाहनों की गति का तकनीकी परीक्षण कराया? यदि कराया तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
- .इस दुर्घटना संभावित क्षेत्र की सुरक्षा और रखरखाव की जिम्मेदारी किस अधिकारी के पास है? संबंधित अधिकारी ने हादसों को रोकने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की?
- क्या पुलिस को दुर्घटनाओं में सड़क की तकनीकी खामियों और विभागीय लापरवाही की जांच करने के लिए कोई रिपोर्ट या तकनीकी दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं?
- . क्या विभाग यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में मोहब्बेवाला में सड़क की खामी या सुरक्षा इंतजामों की कमी से कोई दुर्घटना न हो? इसके लिए समयबद्ध कार्ययोजना क्या है?
- क्या एनएचएआई और पीडब्ल्यूडी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे? या अगली दुर्घटना के बाद फिर निरीक्षण, बैठक और आश्वासन का सिलसिला शुरू होगा?
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