जौनसार में दशहरे पर अनोखी परंपरा, रावण दहन नहीं... पश्चाताप के लिए होता है युद्ध
जौनसार-बावर में दशहरे पर रावण दहन की बजाय 'पाइंता पर्व' मनाया जाता है, जिसमें मंदिरों में आस्था उमड़ती है। इस ...और पढ़ें

दशहरे पर जौनसार में नहीं जलाया जाता रावण, पश्चाताप को होगा गागली युद्ध. File Photo

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भगत सिंह तोमर, साहिया। जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर के रीति-रिवाज व परंपराएं अनूठी हैं। यहां पर दशहरा पर्व पर मैदानी इलाकों की तरह रावण के पुतले का दहन नहीं होता।
दशहरे को पाइंता पर्व के रूप में मनाने की परंपरा है। इस दिन मंदिरों में ईष्ट देव के दर्शन को आस्था उमड़ती है। साथ ही दो बहनों से जुड़ी कहानी को लेकर कुरौली व उत्पाल्टा गांव के ग्रामीणों के बीच पश्चाताप को गागली युद्ध होता है।
पश्चाताप को गागली युद्ध
ग्रामीण अरवी के पत्तों और डंठलों से प्रतीकात्मक युद्ध करते हैं। मान्यता है कि यह आयोजन दो बहनों से जुड़ी एक घटना के पश्चाताप के लिए किया जाता है। इस युद्ध में न कोई हारता है और न ही कोई विजयी होता है। 20 अक्टूबर को मैदानी इलाकों में दशहरा मनाया जाएगा, जबकि जौनसार-बावर में पाइंता पर्व होगा।
कालसी ब्लाक के उत्पाल्टा और कुरौली गांवों के ग्रामीण गागली युद्ध करेंगे। दोनों गांवों ने इसकी तैयारियां पूरी कर ली हैं। उत्पाल्टा के खत स्याणा राजेंद्र सिंह राय, जालम सिंह राय, हरि सिंह राठौर, पूरण सिंह राय, नरेंद्र सिंह राय, अनिल राय, रणवीर सिंह राय, गंभीर सिंह राय, महेंद्र सिंह राय, महिपाल सिंह राय, रविन्द्र सिंह राय, अर्जुन सिंह राय, मुन्ना सिंह राय, बलबीर सिंह राय और स्वराज सिंह राय का कहना है कि गागली युद्ध में बुजुर्गों से लेकर युवा तक भाग लेते हैं।
ग्रामीण अपने-अपने गांव के सार्वजनिक स्थल पर जुटते हैं और ढोल-नगाड़ों तथा रणसिंघे की थाप पर गाते-नाचते हुए गागली के पत्ते और डंठल लेकर देवदार नामक स्थल पहुंचते हैं। वहां दोनों गांवों के बीच युद्ध होता है। युद्ध से लौटकर दोनों गांवों के ग्रामीण पारंपरिक लोक नृत्य करते हैं।
गागली युद्ध के पीछे है एक कहानी
खत के सदर स्याणा राजेंद्र राय ने बताया कि इस परंपरा के पीछे रानी और मुन्नी नाम की दो बहनों की कहानी प्रचलित है। कहानी के अनुसार, उत्पाल्टा गांव की रानी और मुन्नी क्याणी नामक स्थान पर कुएं से पानी भरने गई थीं। रानी अचानक कुएं में गिर गई।
मुन्नी ने घर लौटकर यह बात बताई तो स्वजन व ग्रामीणों ने उसी पर रानी को कुएं में धकेलने का आरोप लगाया। इससे दुखी होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगा दी और अपनी जीवनलीला समाप्त कर दी। घटना पर स्वजन और ग्रामीणों को पछतावा हुआ। इसी की याद में पाइंता पर्व से दो दिन पहले दोनों बहनों की मूर्तियों की पूजा की जाती है।
पर्व के दिन उन्हें उसी कुएं में विसर्जित किया जाता है। मान्यता है कि यह पर्व तब तक मनाया जाएगा, जब तक इन परिवारों में इसी दिन किसी कन्या का जन्म नहीं होगा।
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