जागरण फिल्म फेस्टिवल: जेएफएफ के दूसरे दिन हनुमान अंश सहित दिखाई जाएंगी सात फिल्म, बातचीत सत्र रहेगा खास
जागरण फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन देहरादून में सात फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा, जिसमें बच्चों की फिल्म से लेकर सामाजिक संदेश वाली शॉर्ट फिल्में शामिल हैं।


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जागरण संवाददाता, देहरादून: दुनिया के सबसे बड़े घुमंतु समारोह जागरण फिल्म फेस्टिवल (जेएफएफ) ने शुक्रवार से तीन दिन के लिए दून में पड़ाव डाल दिया। राजपुर रोड स्थित सिल्वर सिटी सिनेमाज में तीन दिवसीय फेस्टिवल के दूसरे दिन आज जहां कुल सात हिंदी, शार्ट फिल्में दिखाई जाएंगी। साथ ही फिल्म जगत से जुड़े लोगों से बातचीत खास रहेगी। सुबह पौने 10 बजे से रात पौने 10 बजे तक दूसरे दिन फेस्टिवल चलेगा।
दोपहर 2:45 बजे फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता सचिन पिलगांवकर से बातचीत का सत्र खास रहेगा। जिसमें वे अपने अनुभव बताएंगे साथ दर्शकों की फिल्म के प्रति सवालों की जिज्ञासा भी शांत करेंगे। इसके अलावा शाम चार बजे : इम्तियाज अली की निर्देश हिंदी फिल्म: स्पेशल सेक्शन: सरहद मैं वापस आऊंगा प्रदर्शित होगी।
शाम सात बजे विशाल चतुर्वेदी की फिल्म हनुमान अंश की स्पेशल स्क्रीनिंग होगी। इस फेस्टिवल को लेकर लोगों में खासा उत्साह है। विभिन्न मुद्दों के साथ सामाजिक संदेश देती फिल्मों को देखने के लिए आज भी काफी संख्या में दर्शक पहुंचेंगे।
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आज दिखाई जाने वाली फिल्में
कनाडाई-अमेरिकी फिल्म: जेएफएफ जूनियर पा पेट्रोल: द डिनो मूवी
निर्देशक: कैल ब्रंकर, अवधि: 88 मिनट
प्रदर्शन: सुबह 9:45 बजे।
फिल्म में पा पेट्रोल की टीम एक रहस्यमयी डायनासोर द्वीप पर पहुंचती है। वहां उनकी मुलाकात रेक्स नाम के एक पपी से होती है, जो लंबे समय से द्वीप पर रह रहा है और डायनासोरों के बारे में काफी जानकारी रखता है। इस बीच मेयर हमडिंगर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए द्वीप पर खनन शुरू कर देता है, जिससे निष्क्रिय ज्वालामुखी सक्रिय हो जाता है। इसके बाद पा पेट्रोल की टीम द्वीप, डायनासोरों और वहां मौजूद लोगों को बचाने के लिए बड़े रेस्क्यू अभियान में जुट जाती है।
हिंदी शार्ट डाक्यूमेंट्री: रागा एंड रिलिक्स
निर्देशक: यति वंदना त्रिपाठी, अवधि: 37 मिनट
प्रदर्शन: सुबह 11:30 बजे।
फिल्म उत्तराखंड की प्राचीन लोक परंपरा छोलिया पर केंद्रित है। इसमें कुमाऊं की इस पारंपरिक युद्ध लोकनृत्य शैली और इसे जीवित रखने वाले लोक कलाकारों की कहानी को सामने लाया गया है। बदलते समय में इस लोक परंपरा के सामने खड़ी चुनौतियों के साथ कलाकारों के संघर्ष और अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने के प्रयासों को फिल्म में दिखाया गया है।
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हिंदी शार्ट फिल्म: जग्गू और मगहारी
निर्देशक: सुदीप सोहनी, अवधि: 24 मिनट
फिल्म की कहानी गढ़वाल की आठ वर्षीय बच्ची जग्गू के इर्द-गिर्द घूमती है। अपने पिता के लिए टिफिन लेकर जाते समय वह अपने गुम हुए खरगोश को तलाशती है। इसी दौरान उसकी मुलाकात गांव में बदनाम एक ऐसे व्यक्ति से होती है, जिसके बारे में उसकी दादी ने उसे दूर रहने की चेतावनी दी होती है। शाम को वही व्यक्ति जग्गू के घर पहुंचता है और कहानी एक अप्रत्याशित मोड़ लेती है।
हिंदी फिल्म: अनमोल-लविंगली आवर्स
निर्देशक: प्रियंका एस. साहा, अवधि: 99 मिनट
प्रदर्शन: दोपहर 12:45 बजे।
फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता सचिन पिलगांवकर से बातचीत का सत्र
प्रदर्शन: दोपहर 2:45 बजे।
हिंदी फिल्म: स्पेशल सेक्शन: सरहद मैं वापस आऊंगा
निर्देशक: इम्तियाज अली, अवधि: 166 मिनट
प्रदर्शन: शाम चार बजे।
फिल्म की कहानी 95 वर्षीय व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने परिवार के साथ रहते हैं और अतीत की यादों में उलझे हुए हैं। उनके मन में पाकिस्तान के सरगोधा लौटने की इच्छा है, जहां उनका अतीत और पुरानी यादें जुड़ी हैं। एक दिन वह सरगोधा जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन सीमा पर उन्हें रोक दिया जाता है।
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हिंदी फिल्म: स्पेशल स्क्रीनिंग—हनुमान अंश
निर्देशक: विशाल चतुर्वेदी, अवधि: 150 मिनट
प्रदर्शन: शाम सात बजे।
फिल्म नीब करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित है। कहानी एक ऐसे युवा साधक के सफर को सामने लाती है, जो भगवान राम की तलाश में निकलता है और आगे चलकर सेवा, भक्ति और समर्पण के मार्ग पर चलते हुए संत के रूप में अपनी पहचान बनाता है। फिल्म में नीब करोली बाबा की भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक संदेश को केंद्र में रखा गया है। यह पारंपरिक बायोपिक के बजाय उनकी आध्यात्मिक यात्रा को सिनेमाई अंदाज में प्रस्तुत करती है।
शार्ट शोकेस के तहत फ्रेंच शार्ट फिल्म: पेल सन
निर्देशक: एड्रियन मोयस डुलिन और जवाहिन जेंतार, अवधि: 16 मिनट
प्रदर्शन: रात 9:45 बजे।
फिल्म की कहानी 12 वर्षीय बच्चे के इर्द-गिर्द है। गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वह अपने पिता के शरीर पर निशान देखकर असहज महसूस करता है। पिता और बेटे के रिश्ते तथा बच्चे के मन में पैदा होने वाली झिझक और भावनात्मक दूरी को फिल्म संवेदनशील तरीके से सामने लाती है। यह एक भावनात्मक ड्रामा है, जिसमें पिता के शरीर और बीमारी को लेकर बच्चे की मनोदशा कहानी का अहम हिस्सा बनती है।
