जागरण फिल्म फेस्टिवल में '21 सितंबर' ने अल्जाइमर और रिश्तों की गहराई को छुआ, दर्शकों की आंखें नम
जागरण फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित '21 सितंबर' फिल्म ने अल्जाइमर से जूझ रहे राज की कहानी दिखाई। यह फिल्म याददाश्त ...और पढ़ें
-1790358809719_m.webp)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण संवाददाता, देहरादून। जागरण फिल्म फेस्टिवल के तहत सिल्वर सिटी सिनेमाज में प्रदर्शित फिल्म 21 सितंबर ने अल्जाइमर से जूझ रहे राज की कहानी के जरिए यह एहसास कराया कि याददाश्त कमजोर पड़ने के बाद भी इंसान के लिए अपनों का साथ कितना जरूरी होता है।
पत्नी सुधकी मृत्यु हो चुकी है, लेकिन राज उसे स्वीकार नहीं कर पाता। उसकी धुंधली होती स्मृतियों में सुधा बार-बार लौटती है और यही इंतजार उसके जीवन का सहारा बना रहता है। करेन क्षिति सुवर्णा के निर्देशन में बनी फिल्म के अंतिम दृश्य देख दर्शकों के आंखों के आंसू आ गए।

फिल्म में राज अपनी घड़ी खो देता है। बेटा पूछता है तो वह कहता है कि घड़ी में जीपीएस लगा था और अब वह अपने पिता की घड़ी पहनेगा। बेटा किरन विदेश में रहता है, लेकिन पिता के संपर्क में बना रहता है। बीमारी बढ़ने के साथ राज धीरे-धीरे बेटे और अपने दोस्त सैम को भी भूलने लगता है।
सैम जब उसे उसकी पत्नी सुधा की याद दिलाता है तो पहले उसे कुछ याद नहीं रहता, लेकिन बार-बार पूछने पर वह उनके प्रेम की बातें करने लगता है। राज बार-बार कहता है कि एक बार सुधा क्वारेंटाइन से बाहर आ जाए तो सब ठीक हो जाएगा।
नौकरानी कमला से वह सुधा को गाना गाने के लिए कहता है। कमला दूसरे कमरे में जाकर कैसेट पर वही गीत बजाती है तो राज खुश हो जाता है और उसे लगता है कि सुधा गा रही है। इधर राज का दोस्त डा. दीपक उसका इलाज करते हुए बीमारी के बीच उसके व्यवहार और यादों को समझने की कोशिश करता है।
फिल्म का भावनात्मक पक्ष तब और गहरा होता है, जब राज को धीरे-धीरे एहसास होने लगता है कि उसकी जिंदगी से बहुत कुछ छूट चुका है। अंत में उसका संवाद, “जिंदगी की गणित में घाटा ही हाथ लगा... जब बेटा बाप को यह बताने लगे कि आपको कब पीना है, कब नहीं, तो समझो मर गया, लेकिन मैं अभी मरा नहीं हूं।
मैं आ रहा हूं सुधा,” दर्शकों को भीतर तक छू गया। फिल्म ने अल्जाइमर को केवल भूलने की बीमारी के रूप में नहीं, बल्कि रिश्तों की परीक्षा के रूप में सामने रखा। दर्शकों के लिए संदेश साफ था कि जब यादें साथ छोड़ने लगें, तब अपनापन, धैर्य और साथ ही व्यक्ति को संभालने का सबसे बड़ा सहारा बनते हैं। स्क्रीनिंग के बाद दर्शक फिल्म के भावनात्मक प्रसंगों और रिश्तों में अपनत्व की जरूरत को लेकर चर्चा करते नजर आए।
अक्टूबर में फिल्म की शूटिंग करेंगे विजय
फिल्म के निर्माता विजय चौधरी ने दर्शकों से संवाद के दौरान फिल्म निर्माण से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि फिल्म को बेहतर बनाने के साथ ही इसे आज के समय में सामने आ रही परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
यह भी पढ़ें- नीलम की शानदार पारी और अमीषा की घातक गेंदबाजी से देहरादून वारियर्स बनी महिला यूपीएल चैंपियन
उन्होंने कहा कि देहरादून के दर्शकों के बीच फिल्म प्रदर्शित होना उनके लिए खास अनुभव है। स्क्रीनिंग के बाद दर्शकों ने फिल्म के भावनात्मक पहलुओं और कहानी को लेकर निर्देशक से सवाल-जवाब भी किए। उन्होंने कहा कि जल्द ही उत्तराखंड में नई फिल्म की शूटिंग करने जा रहे हैं। अक्टूबर में फिल्म की शूटिंग देहरादून समेत विभिन्न क्षेत्रों में की जाएगी।
