जंगल की बात : उत्तराखंड में बायो डायवर्सिटी हैरिटेज साइट की आस अधूरी
जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड में बायो डायवर्सिटी हैरिटेज साइट (विरासतीय स्थल) की आस फिर अधूरी रह गई। यह स्थिति तब है जबकि प्रथम चरण में देवलसारी (टिहरी) और थलकेदार (पिथौरागढ़) के रूप में स्थल चिह्नित हैं।

केदार दत्त, देहरादून। जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड में बायो डायवर्सिटी हैरिटेज साइट (विरासतीय स्थल) की आस फिर अधूरी रह गई। यह स्थिति तब है, जबकि प्रथम चरण में देवलसारी (टिहरी) और थलकेदार (पिथौरागढ़) के रूप में स्थल चिह्नित हैं। दोनों क्षेत्रों के निवासियों की ओर से इस सिलसिले में खुद पहल करते हुए उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड से आग्रह किया गया था। इसके बाद बोर्ड से लेकर शासन स्तर तक हरकत हुई। उम्मीद जताई जा रही थी कि इस मर्तबा अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर समृद्ध जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध देवलसारी व थलकेदार हैरिटेज साइट घोषित हो जाएंगे, मगर यह आस अधूरी ही रह गई। इससे संबंधित क्षेत्र के निवासियों का मायूस होना लाजिमी है, साथ ही इससे सिस्टम की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन दोनों स्थलों को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए सरकार अब बेहद गंभीरता के साथ कदम बढ़ाएगी।
बीएमसी को लाभांश का इंतजार
जैव संसाधनों के संरक्षण के मद्देनजर प्रदेश की 7791 ग्राम पंचायतों, 91 नगर निकायों, 95 विकासखंडों और 13 जिला पंचायतों में जैव विविधता प्रबंधन समितियां (बीएमसी) गठित हो चुकी हैं। जैव विविधता अधिनियम के प्रविधानों के अनुसार राज्य में जैव संसाधनों का व्यवसायिक उपयोग करने वाली कंपनियां, संस्थाएं व कारोबारी अपने वार्षिक लाभांश में से 0.5 फीसद से तीन फीसद तक की हिस्सेदारी बीएमसी को देंगी। संबंधित कंपनियों, संस्थाओं व कारोबारियों से जैव विविधता बोर्ड में लाभांश जमा भी हो रहा। अब तक पांच करोड़ से अधिक राशि जमा हो चुकी है, मगर बीएमसी को इसका वितरण करने में हीलाहवाली हो रही है। पूर्व में निर्णय हुआ था कि इस साल मार्च आखिर तक इसका वितरण कर दिया जाएगा, लेकिन अभी तक इस दिशा में ठोस पहल का इंतजार है। हालांकि, कोरोना संकट भी इसकी वजह है, मगर राशि तो बीएमसी के बैंक खातों में भेजी ही जा सकती है।
थमा नहीं वन्यजीवों का खौफ
छह राष्ट्रीय उद्यान, सात वन्यजीव विहार और चार अतिच्छादी क्षेत्र (कंजर्वेशन रिजर्व) वाले उत्तराखंड में फल-फूल रहे वन्यजीवों के कुनबे पर रश्क किया जा सकता है, मगर यह भी सही है कि समूचा राज्य जंगली जानवरों के खौफ से थर्रा रहा है। हालांकि, लगातार गहराते मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं, मगर वन्यजीवों का खौफ थमने का नाम नहीं ले रहा। इस कड़ी में हाथी, बाघ, गुलदार जैसे जानवरों पर रेडियो कालर लगाकर इनके व्यवहार में आए बदलाव का अध्ययन किया जा रहा है। बावजूद इसके स्थिति में कोई बदलाव आया हो, ऐसा नजर नहीं आ रहा। प्रदेश का शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा होगा, जहां जंगली जानवरों के आतंक ने नींद न उड़ाई हुई हो। सूरतेहाल, चिंता गहराना लाजिमी है। जाहिर है कि परिस्थितियों को देखते हुए नए सिरे से मंथन कर प्रभावी कार्ययोजना तैयार कर इसे धरातल पर उतारने की दरकार है।
जनसहभागिता बढ़ाने की है जरूरत
मानसून सीजन सिर पर है। इसे देखते हुए राज्य में वर्षाकाल में किए जाने वाले पौधरोपण की तैयारियों में वन महकमा जुट गया है। बावजूद इसके वानिकी कार्यों में हर बार ही एक कमी खटकती है और वह जनसहभागिता की। यह जानते हुए कि वानिकी के क्षेत्र में जनसहभागिता वन प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, फिर भी इस दिशा में महकमे की सुस्ती हैरत में डालती है। बताते चलें कि आजादी के पहले से ही वानिकी में यहां का जनसमुदाय भागीदारी निभाता रहा है। प्रदेश में गठित 12 हजार से अधिक वन पंचायतें इसकी तस्दीक करती हैं। वन पंचायतें अपने अधीन वन क्षेत्रों का संरक्षण-संवर्द्धन करने के साथ ही इनसे अपनी जरूरतें भी पूरा करती हैं। इसके बावजूद वन पंचायतों को वह तवज्जो नहीं मिल पाई, जिसकी दरकार है। जरूरत इस बात की है कि पौधरोपण समेत वानिकी से जुड़े कार्यों में वन पंचायतों और ग्रामीणों की सहभागिता बढ़ाई जाए।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।