देहरादून, जेएनएन। उत्तराखंड की स्वास्थ्य सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण के लिहाज से एक अच्छी खबर है। प्रदेश को पिछले साल की तुलना में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत तकरीबन 28 फीसद अधिक बजट मिलने जा रहा है। केंद्र ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए 650 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की है। इस धनराशि से चिकित्सा सुविधाओं में वृद्धि और स्वास्थ्य सूचकांक में सुधार का लक्ष्य है। 

किसी भी प्रदेश की तरक्की का ग्राफ इस बात पर निर्भर करता है कि उसके लोग कितने सेहतमंद हैं। पर स्वास्थ्य सूचकांक की कसौटी पर प्रदेश में स्थिति चिंताजनक है। छोटे-छोटे कई प्रयास जरूर किए गए, पर अब भी कई चुनौतियां मुंह बाएं खड़ी हैं। ऐसे में इस साल राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का फोकस स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ ही स्वास्थ्य सूचकांक में सुधार लाना है, जिसमें केंद्र से स्वीकृत बजट संजीवनी का काम करेगा। बताया गया कि पिछले साल एनएचएम के तहत 504 करोड़ का बजट मिला था, जिसमें तकरीबन 350 करोड़ रुपये खर्च किए जा सके।

यह अलग बात है कि खर्च का यह आंकड़ा 2017 की तुलना में करीब 25 प्रतिशत अधिक है। इस साल एक अच्छी बात और हुई है। लोकसभा चुनाव के चलते बजट की स्वीकृति मार्च में ही आ गई। आचार संहिता लगने से ठीक पहले इसे मंजूरी मिल गई। ऐसे में इसे समयबद्ध ढंग से कार्ययोजना के अनुरूप खर्च किया जा सकेगा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक युगल किशोर पंत ने बताया कि प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं के समयबद्ध विकास के लिए वर्ष 2020 तक का रोडमैप तैयार किया गया है।  इनमें मातृ मृत्यु दर व शिशु मृत्यु दर में कमी पर खास फोकस है। इस बार के बजट से इस बावत प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। इसके अलावा जिला अस्पतालों के सुदृढ़ीकरण पर भी विशेष जोर है, ताकि लोगों को सरकारी अस्पतालों में अधिकाधिक सुविधाएं मिल सकें। 

तीन नए ब्लड स्टोरेज, चार सेपरेशन यूनिट 

खून की कमी से प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों में भी लोगों की जान न जाए और उन्हें जरूरत के समय आसानी से खून मिल सके, स्वास्थ्य विभाग इसकी कवायद में जुटा है। सभी जिलों में ब्लड बैंक की स्थापना के बाद अब दूरस्थ क्षेत्रों में ब्लड स्टोरेज सेंटर स्थापित करने पर फोकस किया जा रहा है। इसके अलावा ब्लड के तमाम कंपोनेंट की उपलब्धता के लिए ब्लड सेपरेशन यूनिट का भी विस्तार किया जा रहा है। 

वर्तमान समय में प्रदेश में नौ ब्लड स्टोरेज सेंटर हैं। इनमें बाजपुर, किच्छा, खटीमा, जसपुर, रामनगर, भवाली, नरेंद्रनगर, कर्णप्रयाग व डोईवाला शामिल हैं। अब तीन अन्य जगह भी इसकी स्थापना की जा रही है। कोटाबाग, द्वारहाट और भिक्यासैंण के लिए लाइसेंस मिल चुका है और जल्द इस ओर कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। इसके अलावा रामनगर में ब्लड बैंक स्थापित करने की कवायद भी अंतिम चरण में है। बीते वर्षों में प्रदेश में डेंगू का प्रकोप ज्यादा रहा है। 

ऐसे में प्लेटलेट्स की उपलब्धता भी एक बड़ा मसला है। ऐसे में रुद्रपुर, बेस अस्पताल हल्द्वानी, रुड़की और कोटद्वार में ब्लड सेपरेशन यूनिट स्थापित की जानी है। फिलहाल देहरादून, हरिद्वार, काशीपुर, बेस हॉस्पिटल श्रीनगर और हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में यह व्यवस्था है। जहां तक ब्लड बैंक का प्रश्न है, प्रदेश के हर जनपद में ब्लड बैंक स्थापित किया जा चुका है। सरकारी क्षेत्र में हाल में 25 ब्लड बैंक हैं, जिसमें 21 राज्य सरकार के अधीन हैं। जबकि चार केंद्रीय स्तर के। इसके अलावा पंद्रह निजी क्षेत्र के ब्लड बैंक हैं। एनएचएम के मिशन निदेशक युगल किशोर पंत ने ब्लड बैंकों की व्यवस्था सुदृढ़ किए जाने की पुष्टि की है। 

अब पीपीपी मोड पर नहीं चलेगी 'खुशियों की सवारी' 

प्रदेश में खुशियों की सवारी का संचालन अब पीपीपी मोड पर नहीं होगा। बल्कि स्वास्थ्य महकमा खुद यह जिम्मेदारी संभालने जा रहा है। यह योजना सीएमओ कार्यालय के स्तर पर संचालित की जाएगी। बता दें, खुशियों की सवारी योजना के माध्यम से राज्य में सरकारी अस्पतालों में प्रसव के उपरात जच्चा-बच्चा को सुरक्षित एवं निश्शुल्क घर तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है। 

इसके अतिरिक्त इस सेवा से राष्ट्रीय स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत आवश्यकतानुसार विद्यार्थियों को लाभ प्रदान किया जाता है। राज्य में इस सेवा की शुरुआत 19 सितंबर 2011 को की गई थी। उस वक्त योजना किराये के वाहनों के माध्यम से संचालित की जा रही थी। जिससे संचालन में कठिनाइया हो रही थीं। 30 मार्च 2013 को खुशियों की सवारी योजना में 90 नए एंबुलेंस शामिल की गई। बाद में इसमें सात वाहन और जुड़े। वर्तमान समय में प्रदेशभर में 97 खुशियों की सवारी संचालित की जा रही हैं। 

108 आपातकालीन सेवा का संचालन कर रही कंपनी जीवीके ईएमआरआइ ही इस योजना को भी संचालित कर रही है। अब जबकि 108 का जिम्मा नई कंपनी कैंप को मिल गया है, माना जा रहा था कि खुशियों की सवारी भी यही कंपनी संचालित करेगी। पर संचालन अब विभागीय स्तर पर किया जाएगा। योजना में वित्तीय सहयोग देने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने इसकी कार्ययोजना तैयार कर ली है। 

विभागीय सूत्रों के अनुसार जनपदों में अब मुख्य चिकित्साधिकारी खुशियों की सवारी के नोडल अधिकारी होंगे। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 500 रुपये प्रति केस भुगतान किया जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि विभागीय स्तर पर यह योजना बेहतर ढंग से संचालित हो पाएगी। अभी तक आपातकालीन सेवा 108 व खुशियों की सवारी का संचालन एक ही कंपनी कर रही थी। यह देखने में आया है कि खुशियों की सवारी के लिए आवंटित बजट कंपनी ने 108 पर खर्च कर दिया। 

बजट की कमी होने पर खुशियों की सवारी के पहिये भी थम गए। जिस कारण लाभार्थियों को योजना से वंचित होना पड़ा। एकल प्रणाली होने से इस तरह की कठिनाई नहीं आएगी। इधर, एनएचएम के मिशन निदेशक युगल किशोर पंत ने आचार संहिता के कारण इस पर कोई टिप्पणी तो नहीं की, पर इसकी पुष्टि उन्होंने की है। उनका कहना है कि अगले कुछ दिन में इसके आदेश हो जाएंगे। 

108 कर्मियों ने सीएम से की समायोजन की मांग 

उत्तराखंड में 108 आपातकालीन सेवा 24 अप्रैल को ठप रहेगी। अनुबंध खत्म होने के बाद एक मई से नौकरियां छूटने के विरोध में इससे जुड़े कर्मचारी सचिवालय का घेराव करेंगे। सोमवार को कर्मचारियों ने अपनी मांग मुख्यमंत्री के सम्मुख रखी। कर्मचारियों ने समायोजन की मांग उनसे की। 

आपातकालीन सेवा 108 और खुशियों की सवारी फील्ड कर्मचारी संघ के सचिव विपिन जमलोकी की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से मिला। उन्होंने सीएम को बताया कि वह कई सालों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन अब उन्हें नई कंपनी के आने के बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। उनकी सेवाएं समाप्ति के नोटिस उन्हें भेज दिये गए हैं। नई कंपनी में समाजयोजन पर अभी कुछ भी तय नहीं हो सका है। जिससे कर्मचारियों को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है। उन्होंने कहा कि जल्द इस पर समाधान नहीं हुआ तो वह कार्य बहष्कार के लिए बाध्य होंगे। 

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Posted By: Raksha Panthari