देहरादून, जेएनएन। शिष्य के सफलता की सीढ़ी चढ़ने में गुरु का सबसे अहम योगदान होता है। इसीलिए गुरु को ब्रह्म, विष्णु, महेश से ऊपर की पदवी दी गई है। गुरु बिना किसी भेदभाव के हर शिष्य को शिक्षा देता है और शिष्य की सफलता पर खुशी भी मनाता है। गुरु के ज्ञान से जीवन का अंधकार दूर करने और शिष्यों की सफलता में गुरु की भूमिका बयां करती कहानियां दैनिक जागरण गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आपके लिए लेकर आया है...

गुरुरुराम राय पीजी कॉलेज के प्रो. वीए बौड़ाई कहते हैं कि मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति को उन्नति के मार्ग पर चलने की सीख देने वाले गुरुजन ही होते हैं। जो भी आज ऊंचे पदों पर हैं वह अपने विद्यार्थी जीवन में किसी न किसी सदाचारी और शिक्षित व्यक्ति को अपना आर्दश मानते होंगे। गुरु की महिमा वेद, पुराण और उपनिषदों में भी है। भारतवर्ष की परंपराओं के अनुसार हम अपने गुरुओं का ऋण कभी भी नहीं चुका सकते हैं। हम चाहे किसी भी ऊंचाई पर पहुंच जाएं हर सफलता के पीछे हमारे शिक्षकों का योगदान ही अहम होता है।

मैंने अपने पूरे विद्यार्थी जीवन में शिक्षकों को अपना सबसे बड़ा अभिभावक माना, उनके बताए हुए रास्ते पर आगे बढ़ा। आज भी मैं नर्सरी कक्षा से लेकर एमफिल तक के अपने किसी भी अध्यापक व अध्यापिका को नहीं भूला हूं और न ही भूल सकता हूं। मैं अपने विद्यार्थियों से यही कहता हूं कि वह अपने अध्यापक के बताए मार्ग पर चलें। गुरुपूर्णिमा पर हर वर्ष मैं अपने गुरुजनों को याद करता हंू। मेरे लिए आज भी गुरु ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समतुल्य हैं।

मनुर्भव महिला बाल कल्याण समिति के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. गिरिबाला जुयाल बताती हैं कि दिव्यांग, बेघर और जरूरतमंद बच्चों की मदद करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य रहा है। मैंने एक गुरु, अभिभावक व समाज सेवक के रूप में पिछले 30 वर्षों से सेवा की है। मनुर्भव महिला बाल कल्याण समिति की स्थापना के बाद से आज तक हजारों गरीब छात्रों की न केवल सहायता की बल्कि उन्हें शिक्षित भी किया। मैने एमए हिंदी से किया और फिर पीएचडी की। इसके बाद वर्ष 1981 में टिहरी गढ़वाल के फकोट गांव में ग्रामीण बच्चों के लिए नर्सरी स्कूल खोली। जिसे बाद में सरस्वती शिशु मंदिर ने अंगीकृत किया। मैं आज भी जिला कारागार सुद्धोवाला में महिला और किशोर बंदियों के लिए नैतिक एवं योग कार्यक्रमों का नियमित आयोजन करती हूं।

डीएवी पीजी कॉलेज के लॉ संकाय विभागाध्यक्ष डॉ. पारुल दीक्षित ने बताया कि डीएवी पीजी कॉलेज में पिछले 12 सालों से पढ़ा रही हूं। लॉ संकाय में पिछले तीन सालों से विभागाध्यक्ष के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभा रही हूं। विभाग का अध्यक्ष बनने के बाद से मेरी प्राथमिकता कॉलेज से लॉ की पढ़ाई कर रहे छात्र-छात्राओं को कानून के क्षेत्र में सफलता की सीढ़ी तक पहुंचाना रहा है। छात्रों की जीतोड़ मेहनत और संकाय में पढ़ाई का माहौल तैयार होने के बाद पिछले छह सालों में करीब 20 छात्र-छात्राएं पीसीएस-जे की परीक्षा पास कर चुके हैं। कई छात्र पीसीएस तक बन गए। छात्रों की यही सफलता मेरे लिए गुरु दक्षिणा है।

पुरकल यूथ डेवलपमेंट सोसायटी के रिसोर्स हहेड मयंक शर्मा ने बताया कि शिक्षा नहीं मिलने के कारण आज भी लाखों बच्चों का भविष्य अंधकार में है। इन बच्चों के जीवन में ज्ञान का दीप जलाकर ये अंधेरा दूर करने के उद्देश्य के साथ ही गोपाल कृष्ण स्वामी ने पुरकल यूथ डेवलेपमेंट सोसायटी की नींव रखी थी। सबसे ज्यादा खुशी इसी बात की है कि आज के समय में पुरकल से पढ़ाई कर चुके बच्चे मल्टीनेशनल कंपनियों से लेकर विभिन्न विभागों में ऊंचे औधे पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सोसायटी हर साल पहली और छटवीं कक्षा में 25- 25 दाखिले लेती है। जिनकी पढ़ाई से लेकर खाने और रहने का पूरा खर्चा सोसायटी उठाती है। मौजूदा समय में 500 छात्र-छात्राएं यहां से निश्शुल्क पढ़ाई कर रहे हैं। अब तक 235 छात्र पास हो चुके हैं और 194 अनाथ या बिन सहारे के छात्रों की पढ़ाई का खर्चा 12वीं के बाद भी उठाया जा रहा है।

मैड संस्था के संस्थापक अभिजय नेगी ने बताया कि मैंने छात्रों के साथ रहते हुए सरकार के समक्ष राजधानी की समस्याओं का मुद्दा उठाया और सरकार से उन पर निर्णय लेने की मांग की। दस्तावेज न होने के चलते हमारी मांग पूरी न हो सकी। वर्ष 2014 में  देहरादून में ही राजपुर रोड कम्यूनिटी इनिसेटिव की रीनू पॉल ने एक दिन हमारी समस्या सुनी। इस दौरान उनसे काफी कुछ सीखने का मौका मिला। पिछले छह साल से उन्हीं का मार्गदर्शन मिल रहा है। यही वजह है कि रिस्पना को बचाने की मुहिम व चाय बागान बचाने के लिए प्रयास किए और सरकार के सामने दस्तावेज दिखाकर इसकी बारीकियां भी बताईं। रीनू पॉल के आशीर्वाद और सहयोग की वजह से आज विभिन्न विषयों पर रिसर्च कर रहे हैं। आठ लोगों की टीम बढ़कर अब 70 तक पहुंच गई है। फेसबुक पर टीम के साथ राज्यभर के 18 हजार युवा छात्र जुड़ गए हैं। रीनू पॉल मैम के सानिध्य में कुछ नया सीखने और जानने का मौका मिला।

विजय एकेडमी के अध्यापक विजय बसनैत का कहना है कि मेरी शिक्षा दीक्षा टिहरी मगराऊं पौखाल गांव के सरकारी स्कूल में हुई। गणित में शुरू से रुचि रही, लेकिन गांव के स्कूल में 11वीं कक्षा में गणित न होने के कारण पढ़ाई के लिए चंबा जाना पड़ा। उच्च शिक्षा के लिए मुझे श्रीनगर आना पड़ा। यहां गणित के अध्यापक डीएस नेगी के मार्गदर्शन में पढ़ाई की। दो बार बैंक में नौकरी के लिए चयन हो गया था, लेकिन दिल में ट्यूशन पढ़ाने की इच्छा थी, इसलिए नौकरी ज्वाइन नहीं की।

कुछ दोस्त और कुछ पढ़ाए हुए बच्चों ने अपना इंस्टीट्यूट खोलने के लिए प्रेरित किया। करनपुर डीबीएस कॉलेज के निकट विजय ऐकेडमी खोलकर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। अब तक 1500 से अधिक पढ़ाए हुए बच्चों का चयन सरकारी विभागों में हो चुका है। करीब 2000 बच्चों को सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करवा रहा हूं। इनमें से कई बच्चे ऐसे भी हैं, जोकि फीस नहीं दे पाते, ऐसे में उन्हें फ्री में पढ़ाता हूं।

सोने की तरह तपाकर काबिल बनाते हैं गुरू

भारत में पुराने समय से ही गुरु शिष्य की परम्परा रही है, जो आज भी कायम है। देश के खिलाड़ी अपनी सफलता का श्रेय माता पिता से पहले अपने कोच के देते हैं। जिनके मार्गदर्शन में वे नई ऊचाइयों को छूते हैं। कई खिलाडिय़ों ने अपने गुरु के मार्गदर्शन में अपने खेल में महारथ हासिल की है। ऐसे ही कई खिलाड़ी और कोच उत्तराखंड में भी मौजूद हैं।

मनीष सिंह रावत और उनके कोच अनूप बिष्ट

मनीष सिंह रावत ने 2016 में रियो ओलंपिक में 13वां स्थान पाकर देश के साथ उत्तराखंड का नाम रोशन किया था। मनीष ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने कोच देवभूमि द्रोणाचार्य अवार्ड विजेता अनूप बिष्ट को दिया। कोच अनूप बिष्ट का कहना है कि वह अपने शिष्यों को अपने बच्चों से भी ज्यादा मानते हैं। मैदान में उनके गेम में सुधार लाने के लिए हर संभव कदम उठाते हैं, लेकिन मैदान के बाहर एक पिता की तरह जिम्मेदारी निभाते हैं।

2016 के यूथ ओलंपिक में भारत को पहला पदक दिलाने वाले एथलीट सूरज पंवार भी अनूप बिष्ट के शिष्य हैं। सूरज पंवार ने 5000 मीटर वॉक रेस में रजत पदक अपने नाम किया है। एथलेटिक्स में सूरज ऐसा करने वाले भारत के पहले एथलीट बन गए हैं। उत्तराखंड के ओलम्पियन मनीष सिंह रावत ने कहा कि वो दौर हमेशा याद रहेगा। जब मेरे गुरु अनूप बिष्ट ने सिखाना शुरू किया। उन्होंने हर अच्छे बुरे समय में पिता की तरह साथ निभाया।

आर्यन जुयाल और कोच रविंद्र नेगी

मूल रूप से उत्तराखंड के हल्द्वानी निवासी युवा क्रिकेटर आर्यन जुयाल उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के लिए खेलते हैं। आर्यन जुयाल ने 2017 में वीनू मांकड़ ट्रॉफी की पांच इनिंग में 401 रन बनाकर सभी का ध्यान अपनी तरफ आकॢषत किया। इसके बाद 2018 में इंडिया अंडर- 19 वल्र्ड कप टीम में बतौर विकेटकीपर बल्लेबाज आर्यन को शामिल किया गया। आर्यन और उनके कोच रविंद्र नेगी का रिश्ता भी पिता और पुत्र जैसा ही है।

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आर्यन जब भी उत्तराखंड आते हैं। पहले वह देहरादून में अपने कोच रविंद्र नेगी से मिलते हैं। उसके बाद अपने घर हल्द्वानी के लिए रवाना होते हैं। आर्यन ने कहा कि मेरे गुरु रविंद्र नेगी सर ने जो क्रिकेट की बारीकियां सिखाई हैं। वह मेरे काम आ रही हैं। उन्होंने कहा कि हम रोज घंटों तक बात करते हैं। वो मुझे रोज टिप्स देतें हैं। अंडर-19 वल्र्ड कप के दौरान भी खाली समय में सबसे पहले अपने कोच से बात करता था। 

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