भगत सिंह तोमर, साहिया: Dussehra 2022: देहरादून जनपद के जनजाति क्षेत्र जौनसार में वर्षों से चली आ रही गागली युद्ध की अनूठी परंपरा को लेकर क्षेत्र के लोगों में काफी उत्साह बना हुआ है। जनजाति क्षेत्र जौनसार-बावर में पांच अक्टूबर को पाइंते यानी दशहरे पर रावण दहन के बजाय उत्पाल्टा व कुरौली के बीच गागली युद्ध होगा।

रोचक है इस युद्ध की कहानी

यह युद्ध पश्चाताप में होता है, जिसके पीछे दो बहनों से जुड़ी कहानी काफी रोचक है। दोनों गांवों के ग्रामीण युद्ध कर पश्चाताप करते हैं।

अरवी के पत्तों व डंठलों से लड़ते हैं जंग

पांच अक्टूबर को होने वाले गागली युद्ध की दोनों गांव के ग्रामीणों ने तैयारियां पूर्ण कर ली हैं। युद्ध में कुरौली व उत्पाल्टा के ग्रामीण गागली यानि अरवी के पत्तों व डंठलों से जंग लड़ते हैं। यह जंग ऐसी है जिसमें किसी की हार या जीत नहीं होती है।

ढोल-नगाड़ों व रणसिंघे के साथ आते ग्रामीण

कालसी ब्लाक क्षेत्र के कुरौली व उत्पाल्टा के ग्रामीण पाइंता पर्व पर अपने-अपने गांव के सार्वजनिक स्थल पर इकट्ठे होकर ढोल-नगाड़ों व रणसिंघे की धुन पर हाथ में गागली के डंठल व पत्तों को लहराते हुए नाचते गाते नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर देवदार नामक स्थल पर पहुंचते हैं। जहां पर दोनों गांवों के ग्रामीणों के बीच गागली युद्ध होता है।

  • गागली के पत्तों व डंठल से युद्ध इतना भयंकर होता है कि देखने वाला भी एक बार घबरा जाता है।

युद्ध में नहीं होती कोई हार जीत

उत्पाल्टा व कुरौली के ग्रामीण खत स्याणा राजेंद्र राय, कुंवर सिंह राय, जालम सिंह, गुलाब सिंह, रणवीर राय, हरि सिंह, सतपाल राय, पूरण सिंह, श्याम सिंह आदि का कहना है कि युद्ध में कोई हार जीत नहीं होती।

युद्ध समाप्त होने पर देते एक दूसरे को बधाई

युद्ध समाप्त होने पर दोनों गांवों के ग्रामीण गले मिलकर एक दूसरे को पर्व की बधाई देते हैं। उसके बाद उत्पाल्टा गांव के सार्वजनिक स्थल पर ढोल नगाडों की थाप पर सामूहिक रूप से नृत्य का आयोजन होता है। जिसमें सभी ग्रामीण पारंपरिक लोक नृत्य तांदी, रासो, हारूल का आनंद लेते हैं।

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यह है गागली युद्ध का इतिहास

गागली युद्ध के पीछे किवदंती है कि कालसी ब्लाक के उत्पाल्टा गांव की दो बहनें रानी व मुन्नी गांव से कुछ दूर स्थित क्याणी नामक स्थान पर कुएं में पानी भरने गई थीं। रानी अचानक कुएं में गिर गई।

  • मुन्नी ने घर पहुंचकर रानी के कुएं में गिरने की बात बताई तो ग्रामीणों ने मुन्नी पर ही रानी को कुएं में धक्का देने का आरोप लगा दिया।
  • जिससे खिन्न होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। इसके बाद ग्रामीणों को बहुत पछतावा हुआ।

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मूर्तियां बनाकर कुएं में की जाती विसर्जित

इसी घटना को याद कर पाइंता के दिन दो बहनों की मूर्तियां बनाकर कुएं में विसर्जित की जाती है। कलंक से बचने के लिए उत्पाल्टा व कुरौली के ग्रामीण हर वर्ष पाइंता पर्व पर गागली युद्ध का आयोजन कर पश्चाताप करते हैं। बताते हैं कि जिन परिवारों की रानी, मुन्नी थी, उन्हीं परिवारों में जब तक इस दिन कन्याओं का जन्म नहीं होता, तब तक यह पाइंता पर्व मनाया जाता रहेगा।

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Edited By: Sunil Negi

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