उत्तराखंड में जंगलों के सीमांकन को एजेंसी नामित, साफ होगी तस्वीर; अतिक्रमण पर भी लगेगा अंकुश
उत्तराखंड में वन भूमि के सीमांकन के लिए सरकार ने एजेंसी नामित की है। आधुनिक तकनीक से सीमांकन किया जाएगा जिससे वन भूमि से जुड़े विवाद दूर होंगे और अतिक्रमण का पता चलेगा। पहले चरण में गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों में सीमांकन होगा। इससे वन प्रबंधन में सुधार होगा और गायब मुनारों की स्थिति स्पष्ट होगी। नीचे विस्तार से पढ़ें पूरी खबर।

राज्य ब्यूरो, जागरण देहरादून। उत्तराखंड में अब न केवल जंगलों की सही स्थिति सामने आएगी, बल्कि वन भूमि को प्रभावी ढंग से अतिक्रमणमुक्त करने में भी मदद मिलेगी। इस कड़ी में जंगलों के सीमांकन के लिए सरकार ने एजेंसी नामित कर दी है।
केंद्र सरकार के उपक्रम आइटीआइ लिमिटेड को यह जिम्मेदारी दी गई है। वन क्षेत्रों के आधुनिक तकनीक से सीमांकन के दृष्टिगत वह डीपीआर तैयार करेगी। पहले चरण में गढ़वाल व कुमाऊं मंडलों में एक-एक वन प्रभाग का सीमांकन कराया जाएगा। इसमें जियोग्राफिक इन्फार्मेंशन सिस्टम और जियोरेफ्रेसिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होगा। फिर अन्य प्रभागों में सीमांकन की कसरत होगी।
71.05 प्रतिशत वन भूभाग वाले उत्तराखंड के जंगल भी अतिक्रमण की गिरफ्त में हैं। वन सीमा को दर्शाने वाली मुनारें तमाम स्थानों से या तो गायब हो चुकी हैं या फिर नष्ट हो गई हैं। कई जगह वन भूमि पर कब्जे हैं तो कई स्थानों पर यह साफ नहीं हो पाता कि संबंधित भूमि वन की है या किसी अन्य विभाग की। ऐसे में वन और निजी व अन्य विभागों की भूमि को लेकर सीमा विवाद की स्थिति अक्सर आती रहती है।
इसे देखते हुए सरकार ने वन सीमा का सीमांकन कराने का निर्णय लिया। बीती 13 अगस्त को हुई कैबिनेट की बैठक में इस पर मुहर लगाई गई। तय किया गया कि डिजिटल तरीके से सीमांकन और इससे संबंधित अभिलेखों का डिजिटाइजेशन किया जाएगा। यही नहीं, सीमांकन में जियोग्राफिक इन्फार्मेंशन सिस्टम और जियोरेफ्रेसिंग जैसी आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल किया जाएगा। अब इस दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं।
वन विभाग के मुखिया प्रमुख मुख्य वन संरक्षक डा समीर सिन्हा के अनुसार सीमांकन के लिए अब एजेंसी नामित कर दी गई है। शासन से हरी झंडी मिलने के बाद एजेंसी डीपीआर तैयार करेगी। उन्होंने कहा कि जंगलों का सीमांकन होने पर वन भूमि से संबंधित विवाद दूर होंगे और वनों के प्रबंधन में प्रभावी मदद मिलेगी। साथ ही यह भी पता चल सकेगा कि वन भूमि पर कहां कहां अतिक्रमण हुआ है, जिसे हटाने को कार्रवाई की जाएगी।
पता चलेगा कि कहां कितनी मुनारें गायब
यह किसी से छिपा नहीं है कि जंगलों की सीमा पर लगी मुनारें तमाम स्थानों से गायब हो चुकी हैं। मसूरी वन प्रभाग इसका उदाहरण है, जहां बड़ी संख्या में मुनारें गायब हुई हैं। यही नहीं, तराई व भाबर क्षेत्र के वन प्रभागों में कई जगह वन भूमि पर अतिक्रमण की बातें सामने आती रही हैं। अब तराई पूर्वी, पश्चिमी व केंद्रीय वन प्रभागों की नए सिरे से कार्ययोजना तैयार हो रही है। इसमें भी यह साफ होगा कि इन क्षेत्रों में कहां-कहां मुनारें गायब हैं।
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