देहरादून, रविंद्र बड़थ्वाल। विशाल प्राकृतिक संपदा से सरसब्ज हिमालयी क्षेत्रों की विशिष्ट भौगोलिक प्रकृति विकास के प्रचलित मॉडल से तालमेल नहीं बिठा पा रही है। वन, जल, नदियों, जैव विविधता के विपुल भंडार के बावजूद हिमालयी क्षेत्रों को खुद की जरूरतें पूरी करने के लिए न पानी है और वनों पर हक-हकूक। खेती के आधुनिक तौर-तरीकों ने देश की तस्वीर बदल दी, लेकिन हिमालय में पुरानी और परंपरागत खेती खुशहाल जीवन की बात तो दूर, दो जून की रोटी का जुगाड़ करने में पिछड़ गई है। विकास के जरूरी ढांचागत सुविधाओं के विस्तार के कदमों को पर्यावरणीय बंदिशों ने थाम दिया है।

जलवायु परिवर्तन जैव विविधता और आजीविका के मौजूदा संसाधनों के सामने आंखें तरेर रहा है। वनों और वन्यजीवों को बचाने की वैश्विक मुहिम में हिमालयी मानव के अस्तित्व पर नया संकट खड़ा हो चुका है। आजादी के बाद से आज तक हुए नीति नियोजन ने यह भी साबित कर दिया कि हिमालयी चुनौती से निपटने को खुद हिमालयी राज्यों को एकजुट होकर उठ खड़ा होना होगा। रविवार को मसूरी में 11 हिमालयी राज्य इसी मकसद से साझा मंच पर आ रहे हैं। 15वें वित्त आयोग और नीति आयोग समेत देश के नीति नियंताओं की मौजूदगी में हो रहे हिमालयन कॉन्क्लेव के संयुक्त मसौदे को तैयार किया जाएगा। 

ख्वाब सरीखा रहा है सतत विकास

हिमालयी राज्यों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सतत विकास की है। देश के शेष मैदानी राज्यों की तुलना में हिमालयी राज्यों को विकास के मोर्चे पर एक-एक इंच के लिए जूझना पड़ रहा है। पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्र होने की वजह से सड़कें, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य तमाम बुनियादी सुविधाओं के विस्तार में पर्यावरणीय अड़चनें तो हैं ही, अधिक धन भी खर्च हो रहा है। प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध हिमालय वित्तीय मोर्चे पर बेहद कमजोर है। इस वजह से अपने बूते बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हिमालयी राज्यों के लिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है। निर्माण कार्यों की लागत काफी ज्यादा है। वहीं निर्माण कार्यों के लिए तय की जाने वाली दर (शिड्यूल ऑफ रेट) हिमालयी क्षेत्र में आने वाली लागत के बजाय अन्य मैदानी राज्यों की तर्ज पर तय की जा रही हैं। केंद्रपोषित योजनाओं में भी यही हो रहा है। इस वजह से ये योजनाएं भी पहाड़ चढ़ने पर हांफ रही हैं। हिमालयी राज्य अपने सतत विकास के लिए अलहदा नीति नियोजन चाहते हैं। 

जी का जंजाल बनीं पर्यावरणीय सेवाएं

हिमालय की ताकत उसका विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र है। इसकी बदौलत पूरे देश को पर्यावरण सुरक्षा का कवच हासिल है। उत्तराखंड की बात करें तो 71 फीसद वन क्षेत्र, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों को किसी तरह के हक-हकूक नहीं हैं। अब यह वन क्षेत्र परंपरागत कृषि के लिए भी बड़ी समस्या बन चुका है। जंगली जानवरों से खेती की सुरक्षा का बड़ा सवाल अनसुलझा है। किसान खेतों, उद्यानों और उपज की सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं। गंगा और यमुना अपनी सहायक नदियों के संग देश को भले ही तृप्त करे, लेकिन खुद हिमालय, उसके पहाड़ और जनता प्यासी और सिंचाई सुविधाविहीन है। प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये की पर्यावरणीय सेवाओं के एवज में ग्रीन डेफिसिट राज्यों की ओर से हिमालयी राज्यों को प्रतिपूर्ति मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार ने इस पर नीतिगत फैसला अब तक नहीं लिया। 

पलायन और आपदा

11 पर्वतीय राज्यों के लिए सबसे बड़ी चुनौती पलायन और आपदा के रूप में है। रोजगार और आजीविका के साधन नहीं होने की वजह से पलायन तेजी से बढ़ा है। सिर्फ उत्तराखंड में ही अब तक 1700 से ज्यादा गांव जनशून्य हो चुके हैं। पर्वतीय गांवों से शहरों की ओर से तेजी से पलायन जारी है। हिमालयी राज्य इस समस्या से पार पाने के लिए अलहदा नीतिगत व्यवस्था चाहते हैं। साथ में आपदा के प्रति बेहद संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों को हर साल हजारों करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है। 

पर्यटन-वेलनेस, आधुनिक खेती-बागवानी से उम्मीदें

हिमालयी राज्यों को प्राकृतिक खूबसूरती सौगात में मिली है। यही वजह है कि पर्यटन को इन राज्यों के लिए बेहद संभावनाशील क्षेत्र माना जाता है। इसके बूते इन राज्यों की आर्थिकी में बड़ा बदलाव मुमकिन है। रोजगार और आजीविका के साथ ही पर्यटन व वेलनेस सेक्टर इन राज्यों को वित्तीय रूप से भी सक्षम बना सकता है। पर्यटन क्षेत्र के विकास में बड़ी अड़चन ढांचागत सुविधाओं और सेवाओं की कमी है। ढांचागत विकास के लिए इन राज्यों को केंद्र से अतिरिक्त मदद की दरकार है। 

दबाव बनाना चाहते हैं हिमालयी राज्य

हिमालयी राज्य अभी अपनी जरूरतों और चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार पर अलग-अलग जद्दोजहद करते रहे हैं। उत्तराखंड की पहल पर पहली बार सभी 11 हिमालयी राज्य त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड एक मंच पर एकत्रित हो रहे हैं। कॉन्क्लेव में हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्री हिमालयी क्षेत्र की चुनौतियों पर मंथन कर संयुक्त मसौदा तैयार करेंगे। इसे अब तक उपेक्षा का दंश झेलते आ रहे हिमालयी राज्यों की नीति आयोग और 15वें वित्त आयोग तक अपनी बात पहुंचाने के दबाव बिंदु के तौर पर भी देखा जा रहा है। 

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Posted By: Raksha Panthari

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