देहरादून, जेएनएन। अखबार से कोरोना वायरस के संक्रमण की आशंका निराधार व पूरी तरह गलत है। समाचार पत्रों व अन्य कागजों से कोरोना फैलने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। विशेषज्ञ भी इसकी लगातार पुष्टि कर रहे हैं।

उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (यूसर्क) के निदेशक डॉ. दुर्गेश पंत ने कहा कि अखबार से कोरोना वायरस का संक्रमण फैलता है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यहां तक कि किसी भी वस्तु से कोरोना वायरस पैदा नहीं होता, बल्कि यह ऐसा संक्रमण है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण को लेकर केंद्र की मोदी सरकार ने देशभर में जो संपूर्ण लॉकडाउन का कदम उठाया है वह सबसे बड़ा लाभकारी कदम हैं। या यूं कहें कि कोरोना के खिलाफ यदि जंग जीतनी है तो लॉकडाउन और सोशल डिस्टिेंसिंग का पालन करना होगा।

कोरोना वायरस जैसी महामारी से देश ही नहीं, पूरा विश्व इसकी चपेट में है। ऐसी विकट परिस्थितियों में आमजन के मन में असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि सभी पाठकों को यह जानना जरूरी है कि समाचार पत्रों को छापते समय जिस स्याही का प्रयोग होता है, उसमें पहले से ही एक एंटीबायोटिक पदार्थ टॉक्सिसिटी मिश्रित होता है। इस प्रकार के मिश्रण में कोरोना जैसे किसी भी वायरस की जिंदा होने की संभावना नहीं के बराबर है। 

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जिस प्रकार आजकल हर व्यक्ति सेनिटाइजर का प्रयोग हाथों में कर रहा है ठीक उसी प्रकार अखबार छापते समय वह पूरी तरह सेनिटाइज होकर ही बाजार में आता है। सोशल मीडिया पर कुछ इस तरह के मैसेज वायरल हो रहे हैं, जिनमें अखबारों से संक्रमण फैलने की आशंका जताई गई थी वह निराधार और भ्रामक है। पाठकों को पहले की ही तरह अपने अखबार का नियमित पढ़ाना जारी रखना चाहिए, ताकि उन्हें सरकार व शासन की ओर से कोरोना संक्रमण को लेकर किए जा रहे तमाम एहतियात के बार में संपूर्ण जानकारी मिल सके।

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