देहरादून, जेएनएन। निकाय चुनाव को 2019 का सेमीफाइनल माना जा रहा है। बेशक चुनाव परिणाम का राज्य और केंद्र की सरकारों पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला, लेकिन इनमें हार-जीत राजनीतिक दलों के मनोबल पर बहुत असर डालेगी। राज्य के सबसे बड़े नगर निगम देहरादून की बात करें तो मुकाबला कांटे का रहा है। यही नहीं, इस सियासी जंग में भाजपा-कांग्रेस ने एक-दूसरे के गढ़ में भी सेंध लगाई। 

प्रदेश के सबसे पुराने नगर निगम में सियासी मोर्चे पर दिलचस्प टक्कर दिखी। पिछली बार की जीत-हार का आकलन किया जाए तो सियासी दल एक दूसरे को झटका देने में कामयाब हुए हैं। लक्खीबाग के पार्षद सुशील गुप्ता की हार सबसे चौंकाने वाली रही है। 

वरिष्ठ एवं अनुभवी सुशील को कांग्रेस के 23 वर्षीय युवा प्रत्याशी आयुष गुप्ता के हाथों हार का सामना करना पड़ा। आमवाला तरला से भाजपा की नीतू वाल्मीकि व बल्लूपुर से शारदा गुप्ता को भी हार का मुंह देखना पड़ा। यही नहीं, यमुना कालोनी से दस साल से सत्ता पर काबिज रहे दंपत्ति सचिन एवं नेहा गुप्ता भी हार गए। 

यह सीट क्रमश: रीता रानी, कोमल वोहरा व सुमित्रा ध्यानी ने कब्जाई। यह तीनों कांग्रेस से हैं। पिछली बार रेस्ट कैंप की सीट भाजपा के खाते में थी, पर इस बार परिणाम कांग्रेस के पक्ष में गया। ऐसा नहीं है कि केवल कांग्रेस ने भाजपा के गढ़ में सेंध लगाई, कई भाजपाई भी ऐसा करने में कामयाब हुए हैं। 

गत वर्ष विजय कालोनी में कांग्रेस का कब्जा था, पर इस बार भाजपा के सतेंद्र ने जीत दर्ज की। करनपुर में पिछली बार विनय कोहली कांग्रेस के टिकट पर लड़े थे, पर बाद में उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली। इस बार भाजपा ने उनकी पत्नी प्रमिला कोहली को टिकट दिया था। यहां भी भगवा लहराया। खुड़बुड़ा, डिफेंस कालोनी, गोविंदगढ़, अजबपुर व माजरा भी इस बार भाजपा के खाते में गए। 

कांग्रेस में एकजुटता पर भारी अहम का टकराव

कांग्रेस ने इस बार निकाय चुनाव में मजबूती से खम ठोकी। पहली बार दो नगर निगमों में खाता खुला तो जिला मुख्यालयों वाले निकायों और नगरपालिका परिषदों में पार्टी मजबूती से उभरी। इसके बावजूद नतीजों के मामले कुछ बेहतर कर गुजरने की पार्टी की चाहत दिग्गजों के अहम के टकराव में उलझकर रह गई। 

नतीजतन केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारों को एंटी इनकंबेंसी का अहसास कराने के पार्टी के मंसूबे पूरे नहीं हुए। वहीं चुनाव प्रचार के दौरान दिग्गज एकजुट दिखने के बजाय छितरे रहे। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव प्रचार में रस्म अदायगी तक सिमट गए तो पार्टी के बड़े केंद्रीय नेताओं ने इस अहम चुनाव में प्रचार से खुद को दूर रखा। 

वहीं निकाय चुनाव के रणनीतिकारों में शामिल नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश बतौर स्टार प्रचारक हल्द्वानी से बाहर नहीं निकल पाई। उनके ताकत झोंकने के बाद भी हल्द्वानी में पार्टी के सिर पर जीत का सेहरा नहीं बंध सका। 

अलबत्ता, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह चुनाव प्रचार का जिम्मा अकेले अपने कंधों पर संभाले हुए दोनों मंडलों में आखिर तक जूझे। दृष्टिपत्र का असर नहीं निकाय चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारों के एंटी इनकंबेंसी फैक्टर को फोकस करते हुए बुनी गई। चुनाव से हफ्ताभर पहले निकायों के लिए जारी कांग्रेस के दृष्टि पत्र में केंद्र और राज्य की सरकारों को निशाना बनाया गया था। 

निकाय चुनाव में पार्टी ने नोटबंदी, जीएसटी, पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस की मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दे उछाले, लेकिन यह कोशिश परवान चढ़ने को तरस गई। कांग्रेस का दृष्टिपत्र मतदाताओं को लुभाने में कारगर साबित नहीं हुआ।

दरअसल, चुनाव प्रचार में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस काफी पीछे रह गई। स्टार प्रचारकों में शामिल नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने निकाय चुनाव की रणनीति बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन हल्द्वानी नगर निगम में ताकत झोंकने के बाद भी वह निगम महापौर पद के प्रत्याशी अपने पुत्र को जीत नहीं दिला सकीं। 

एकजुट नहीं दिखे स्टार प्रचारक 

एक ओर कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी और सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा चुनाव प्रचार को लेकर पूरी तरह मुस्तैद रही। भाजपा में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और मंत्रिमंडल में उनके सहयोगी चुनाव में सक्रिय दिखे। कांग्रेस ने बतौर पार्टी इससे सबक लेने की जरूरत नहीं समझी। चुनाव में पार्टी ने 56 स्टार प्रचारक उतारे। बड़े नामों ने इक्का-दुक्का या बेहद सीमित सभाओं में शिरकत की। 

बताया जा रहा है कि अहम के टकराव के चलते पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का पूरा उपयोग नहीं हो पाया तो स्टार प्रचारकों में शामिल पूर्व स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल चुनाव के आखिरी दौर तक प्रदेश संगठन को निशाने पर लेने से नहीं चूके। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह दोनों मंडलों में स्टार प्रचारक के तौर पर अकेले मुस्तैद रहे। 

कांग्रेस के रणनीतिकार भी अब मान रहे हैं कि पार्टी ने भाजपा की तर्ज पर पूरी ताकत और एकजुटता से चुनाव प्रचार किया होता तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती। पार्टी अपने दिग्गजों व क्षत्रपों की ताकत बटोर नहीं पाई।

तो कांग्रेस ने कब्जाए भाजपा के 50 फीसद वोट

नगर निकाय चुनाव के नतीजे भले ही भाजपा को अच्छी-खासी जीत मिलने और कांग्रेस अच्छे प्रदर्शन के बावजूद उत्साहजनक नतीजों को तरसने की तस्दीक कर रहे हों, लेकिन कांग्रेस का खुद का आकलन इसके एकदम उलट है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह का मानना है कि एंटी इनकंबेंसी फैक्टर ने असर दिखाया है। 

विधानसभा चुनाव की तुलना में निकाय चुनाव में कांग्रेस अपनी धुर विरोधी भाजपा को पीछे धकेलने में कामयाब रही है। सिर्फ देहरादून नगर निगम में ही विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 70 हजार से ज्यादा मतों की बढ़त मिली थी। निकाय चुनाव में यह फासला घटकर 35 हजार तक पहुंचा है। कांग्रेस ने वर्ष 2013 की तर्ज पर निकाय चुनाव के इतिहास को दोहराने की भरसक कोशिश तो की, लेकिन पार्टी के मंसूबे पूरे नहीं हो सके। 

वर्ष 2013 में केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकारें थीं, लेकिन भाजपा ने इसी वर्ष हुए निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस को जमकर पटखनी दे दी थी। कांग्रेस नगर निगम में खाता खोलने को तरस गई थी। भाजपा को महापौर समेत अध्यक्ष पद की कुल 69 सीटों में 22 पर विजयश्री मिली थी, लेकिन कांग्रेस को सिर्फ 20 पर संतोष करना पड़ा था। 

वर्ष 2018 में केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारों के रहते हुए निकाय चुनाव में कांग्रेस ने वही इतिहास दोहराने का ख्वाब तो देखा, लेकिन यह हकीकत से कोसों दूर रह गया। कुल 84 निकायों के लिए हुए चुनाव में पार्टी दो नगर निगमों, 15 नगरपालिका परिषदों और आठ नगर पंचायतों समेत कुल 25 निकायों पर काबिज हुई है, जबकि भाजपा को 34 निकायों में कामयाबी मिली। 

इस सबके बावजूद कांग्रेस विधानसभा चुनाव से करीब पौने दो साल की अवधि में निकाय चुनाव तक आते हुए अपने प्रदर्शन को बेहतर मान रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि एंटी इनकंबेंसी फैक्टर अपना असर दिखा रहा है। इस फैक्टर के चलते भाजपा विधानसभा चुनाव के अपने प्रचंड बहुमत के प्रदर्शन को दोहरा नहीं सकी। 

सिर्फ देहरादून नगर निगम क्षेत्र में विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से 70 हजार से ज्यादा मत हासिल किए थे। रायपुर, राजपुर रोड, धर्मपुर और कैंट विधानसभा क्षेत्र नगर निगम में पूरी तरह शामिल हैं, जबकि सीमा विस्तार के बाद इसमें पुराने क्षेत्र से सटा बड़ा ग्रामीण क्षेत्र शामिल किया जा चुका है। 

प्रीतम सिंह ने दावा किया निकाय चुनाव में यह फासला घटकर 50 फीसद यानी 35 हजार तक रह गया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब 2019 में भाजपा को शिकस्त देने लोकसभा चुनाव को और मजबूती से लड़ेगी।

25 वार्डों में ही कांग्रेस बना पाई बढ़त

100 वार्ड के नगर निगम में कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी दिनेश अग्रवाल महज 25 वार्डों पर ही बढ़त बना पाए, जबकि भाजपा प्रत्याशी सुनील उनियाल गामा को 75 वार्डों पर बढ़त हासिल हुई। दिलचस्प यह कि दिनेश अग्रवाल ऐसे 14 वार्डों में भी बढ़ नहीं बना पाए, जिनमें कांग्रेस के पार्षद प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई है। 

इसका मतलब यह भी हुआ कि ये प्रत्याशी दिनेश अग्रवाल के लिए समर्थन नहीं जुटा पाए। हालांकि 20 वार्डों अग्रवाल पर भाजपा के महापौर प्रत्याशी पर बढ़त मिली। इन वार्डों में भी कांग्रेस के प्रत्याशी निर्वाचित हुए हैं।

दूसरी तरफ 75 वार्डों पर बढ़त बनाने वाले भाजपा प्रत्याशी गामा को पार्षद प्रत्याशियों की सक्रियता का भी लाभ मिला है। 

इस चुनाव में भाजपा के 60 पार्षद जीतकर आए हैं और भाजपा पार्षद वाले महज चार ही वार्डों में गामा का ग्राफ दिनेश अग्रवाल से कम रहा। हालांकि यह अंतर काफी कम है। जिन वार्डों में गामा आगे रहे, उनमें यह अंतर भी काफी अधिक रहा। यही कारण है कि गामा न सिर्फ 75 वार्डों पर आगे रहे, बल्कि मतों का अंतर अधिक होने के चलते वह अग्रवाल पर 35 हजार 632 मतों की बढ़त बना पाने में सफल रहे।

कांग्रेस के ये विजयी प्रत्याशी नहीं दिला पाए बढ़त

वार्ड-2 विजयपुर, वार्ड-3 रांझावाला, वार्ड-4 राजपुर, वार्ड-18 इंदिरा कॉलोनी, वार्ड-32 बल्लूपुर, वार्ड-33 यमुना कॉलोनी, वार्ड-35 श्रीदेव सुमन नगर, वार्ड-50 राजीव नगर, वार्ड-51 वाणी विहार, वार्ड-56 धर्मपुर, वार्ड-89 हरभजवाला, वार्ड-96 नवादा।

भाजपा के ये पार्षद नहीं दिला पाए बढ़त

वार्ड-20 रेसकोर्स उत्तर, वार्ड-71 पटेलनगर पूर्व, वार्ड 77 माजरा, वार्ड 81 रेसकोर्स दक्षिण।

धर्मपुर से बाहर नहीं दिखा असर

कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी दिनेश अग्रवाल को जिन वार्डों में बढ़त हासिल हुई है, उनमें अधिकतर उनके विधानसभा क्षेत्र धर्मपुर के हैं। अग्रवाल इससे पूर्व के दो विधानसभा चुनाव में धर्मपुर से विधायक चुने गए हैं। हालांकि इस दफा भाजपा के विनोद चमोली ने यहां से मैदान मार लिया, मगर अग्रवाल की यहां सक्रियता निरंतर बनी है। इस चुनाव में भी दिनेश अग्रवाल अपने ही क्षेत्र तक सिमटे रहे और उन्हें बाहर निकालने के लिए पार्टी स्तर पर भी कोई प्रयास नहीं किए गए।

राजपुर व धर्मपुर विस में मात खा गई भाजपा

नगर निगम देहरादून के महापौर पद के चुनाव परिणाम ने भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें डाली है। इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के महापौर प्रत्याशी को कांग्रेस प्रत्याशी के मुकाबले नौ हजार से ज्यादा वोट कम मिले हैं।  

नगर निगम देहरादून के चुनाव में भाजपा के महापौर प्रत्याशी सुनील उनियाल गामा के सिर जीत का ताज सजने के बाद ही विधायकों की परफॉरमेंस का आंकलन शुरू हो गया है। यही कारण है कि सात विधानसभाओं में पार्टी प्रत्याशी को मिले मतों के पीछे इसका नफा-नुकसान की समीक्षा भी होने लगी है। 

राजपुर में भाजपा को 20 हजार 546 और कांगे्रस को 18 हजार 172 वोट मिले हैं। करीब दो हजार वोट का नुकसान पार्टी को यहां उठाना पड़ा। धर्मपुर विधानसभा की स्थिति ज्यादा खराब रही। भाजपा को यहां 31 हजार 678 और कांग्रेस को 38 हजार 430 वोट मिले हैं। 

यानि लगभग सात हजार वोट कम पर भाजपा को संतोष करना पड़ा। रायपुर का बड़ा हिस्सा नगर निगम में शामिल होने का फायदा जरूर पार्टी प्रत्याशी को मिला है। यहां भाजपा को नए क्षेत्र से करीब 14 हजार वोट ज्यादा मिले हैं। 

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की विधानसभा डोईवाला ने सभी विधायकों को पीछे कर दिया। यहां सिर्फ नगर निगम के सात वार्ड हैं। बावजूद गामा को यहां छह वार्डों में बंपर 18 हजार 485 वोट मिले। जबकि कांग्रेस को केवल आठ हजार वोट मिले। 

महापौर को मिले मत

विधानसभा----------------भाजपा--------कांग्रेस 

धर्मपुर--------------------31678-------38430 

राजपुर-------------------18172--------21546

मसूरी--------------------18471--------12416

रायपुर-------------------43229---------26459

कैंट----------------------25864---------17738

डोईवाला----------------18805------------7936

सहसपुर------------------6237------------3359

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Posted By: Bhanu

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