केदार दत्त, देहरादून। विषम भूगोल वाले उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल के लोकजीवन में गहरे तक रची-बसी है घुघुती। यूं कहें कि संपूर्ण जनमानस और संवेदनाओं के साथ इस खूबसूरत पक्षी का बेहद करीबी रिश्ता है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यही वजह भी है कि गढ़वाल और कुमाऊं के लोकगीतों में घुघुती को समान रूप से प्रमुखता मिली है। 'प्यारी घुघूति जैलि मेरी मांजी तैं पूछि एैलि...' जैसे गीत को ही लें तो इसमें छिपे उदासी के भाव से कठोर से कठोर हृदय भी पिघल जाता है। पर्वतीय अंचल में सुख-दुख, संयोग-वियोग, खुद, प्यार-दुलार, त्याग समेत संपूर्ण संस्कृति से घुघुती का अटूट रिश्ता है।

पहाड़ के सभी क्षेत्रों में मिलने वाली घुघुती (डोव) ऐसा पक्षी है, जिसका यहां के जनमानस से करीबी संबंध है। यहां की माटी के रंगों में रची-बसी और दिखने में बेहद सुंदर घुघुती की घूर-घूर (आवाज) हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करती है। घुघुती सदियों से पहाड़ी लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यही कारण भी है कि लोकरंगों में जितनी तवज्जो इस पक्षी को मिली है, उतनी शायद अन्य किसी को नहीं।

लोकगीतों में तो घुघुती को खूब महत्व मिला है और ये गीत उदासी में भी रंग घोलते नजर आते हैं। 'मेरी प्यारी घुघूति जैलि मेरी मांजी तैं पूछि ऐलि...' जैसा खुदेड़ गीत आज भी आंखों को नम कर देता है। सरहद की हिफाजत में तैनात अपने फौजी पति की याद में खोई उसकी पत्नी घुघुती की घूर-घूर सुनते ही कह उठती है 'ना बास घुघुती घूर घूर स्वामि जयां छन दूर-दूर...।' घुघुती के उड़ने पर वह उसका संदेशा पति तक पहुंचने की अनुभूति का अहसास करती है।

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घुघुती से जुड़े अन्य लोकगीतों का जिक्र करें तो 'ना बासा ना बासा, घुघुती न बासा, अमै की डाई मां घुघुती न बासा...', 'घुघुती घुरोण लैगे मेरा मैत की, बौडि़-बौडि़ ऐगे ऋतु चैत की...', 'ना बास घुघुती चैत की खुद लगीं च मां मैत की...' जैसे लोकगीत आज भी खूब गुनगुनाए जाते हैं। ये सभी सुख-दुख, संयोग-वियोग, रैबार, खुद, स्नेह से जुड़े हैं। साफ है कि घुघुती का पहाड़वासियों के साथ ही पर्वतीय अंचल के कण-कण से नाता है। इसीलिए तो वह यहां के निवासियों के दिलों पर राज करती है।

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Edited By: Raksha Panthri