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बदरीनाथ के ऊपर लटकते ग्लेशियरों से 398 भवन और ढांचा खतरे में

Published: Sun, 01 Nov 2026 11:17 PM (IST)

बदरीनाथ क्षेत्र के ग्लेशियरों से हिमस्खलन का बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जिससे 398 भवन और महत्वपूर्ण ढांचा प्रभावित हो सकता है।

यह तस्वीर एआई से बनाई गई है

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सुमन सेमवाल, देहरादून। बदरीनाथ धाम क्षेत्र की पहाड़ियों पर लटकते ग्लेशियरों से बर्फ टूटकर नीचे गिरने की स्थिति में बड़ा हिमस्खलन हो सकता है। इससे करीब 398 भवन, 2.66 किलोमीटर सड़क परिवहन ढांचा, दो पुल, हेलीपैड और पार्किंग क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।

इसके अलावा 3.87 हेक्टेयर कृषि भूमि और 15.57 हेक्टेयर वन क्षेत्र भी खतरे के दायरे में आ सकते हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी), रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के विज्ञानियों के ताजा अध्ययन में यह आशंका जताई गई है।

अध्ययन को 28 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका लैंडस्लाइड्स में प्रकाशित किया गया। विज्ञानियों ने समुद्र तल से 4700 से 5465 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तीन ग्लेशियरों का अध्ययन किया। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले उपग्रह चित्रों, रिमोट सेंसिंग और डिजिटल ऊंचाई आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया।

तीनों स्थलों में साइट-2 के अनाम ग्लेशियर को सबसे अधिक जोखिम वाला पाया गया। इसकी सतही ढलान 34.57 डिग्री और आधार की ढलान 30.64 डिग्री है। इसके बर्फ आयतन का अनुमान 53.2 से 58.9 लाख घन मीटर के बीच है। मॉडल के अनुसार बर्फ टूटने पर हिमस्खलन की अधिकतम रफ्तार 78.5 मीटर प्रति सेकंड और प्रवाह की ऊंचाई 73.5 मीटर तक पहुंच सकती है।

तीन परिस्थितियों में किया सिमुलेशन

वैज्ञानिकों ने रैपिड मास मूवमेंट सिमुलेशन (रैम्स) मॉडल से कम, मध्यम और अधिक गतिशीलता वाली परिस्थितियों में हिमस्खलन का आकलन किया। अध्ययन में पाया गया कि इसकी दूरी केवल बर्फ की मात्रा से तय नहीं होती। पहाड़ी नालियों का आकार, ढलान और नीचे की जमीन की बनावट भी इसकी गति और प्रभाव को प्रभावित करती है।

निर्माण नियंत्रण और निगरानी पर जोर

शोधकर्ताओं ने संवेदनशील क्षेत्रों में खतरा मानचित्र बनाने, सुरक्षित क्षेत्र चिह्नित करने, नए निर्माण नियंत्रित करने और पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने की जरूरत बताई है।

बर्फ की मोटाई और आयतन का आकलन प्रत्यक्ष माप के बजाय उपग्रह आंकड़ों और गणितीय मॉडल से किया गया है। इसलिए परिणामों में कुछ अनिश्चितता संभव है। अध्ययन का संदेश स्पष्ट है कि बदरीनाथ में आपदा आने की प्रतीक्षा करने के बजाय वैज्ञानिक निगरानी और सुरक्षित निर्माण नियोजन पर अभी से काम करना जरूरी है।

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