देहरादून, जेएनएन। आयुष मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय केवल डिग्री बांटने तक ही सीमित न रहे। विवि शोध कार्य प्रमुखता व बड़े पैमाने पर शुरू करे, ताकि इसका लाभ न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरी दुनिया को आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के रूप में मिल सके। 

यह बात उन्होंने बतौर मुख्यअतिथि उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित हुए कही। विवि के बायोमेडिकल संकाय व राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट स्थित आइसीएफआरई सभागार में शुक्रवार से शुरू हुई। 'उच्च शिखरीय औषधीय व सगंध वनस्पति के संरक्षण और संवर्धन' विषय पर आयोजित संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को आयुष शिक्षा मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में सबसे अधिक जैव विविधता उत्तराखंड में पाई जाती है। सैकड़ों जड़ी-बूटियां राज्य में पाई जाती है। जिसकी पहचान, संरक्षण व संवर्धन जरूरी है। 

उन्होंने कहा गंगा की शुद्धता और निर्मलता की जांच यहां की जैव विविधता से की जानी चाहिए। हरिद्वार तक गंगा जल पीने लायक है इससे आगे गंगा की क्या स्थिति है यह सबके सामने है। इसलिए गंगा की स्वच्छता व निर्मलता बनाए रखने में उत्तराखंड की पहल बेहद सार्थक है। उन्होंने उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड के माध्यम से आयुर्वेद विवि को 30 लाख के शोध प्रोजेक्ट दिलवाने की घोषणा की। कार्यशाला की अध्यक्षता उत्तराखंड आयुर्वेद विवि के कुलपति प्रो.(डॉ.) सुनील कुमार जोशी ने की। 

कार्यशाला में प्रस्तुत किए जाने वाले शोध पत्रों की स्मारिका का अनावरण भी किया गया। कार्यशाला में मारीशस, नेपाल, भूटान आदि देशों के विशेषज्ञ शोधार्थी भाग ले रहे हैं। कार्यशाला में राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के डिप्टी सीईओ विक्रम सिंह व हिमालयन ड्रग्स के निदेशक डॉ. एस फारूक ने अपने उद्बोधन में शोध के महत्वों को छात्रों के सामने रखा और उत्तराखंड को औषधीय पौधों को भंडार बताया। इस मौके पर उत्तराखंड आयुर्वेद विवि की कुलसचिव डॉ. माधवी गोस्वामी, आयुर्वेद विवि के निदेशक प्रो. राधा वल्लभ सती, प्रसिद्ध वैद्य मायाराम उनियाल, डॉ.नवीन जोशी, डॉ. डीके सेमवाल, डॉ. पीके गुप्ता डॉ. राजीव कुरेले, डॉ. आशुतोष चौहान धर्मेंद्र राणा आदि मौजूद रहे। 

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आयुष के शोधार्थी स्टार्टअप अपनाएं

यूकॉस्ट के महानिदेशक डॉ. राजेंद्र डोभाल ने कहा कि उत्तराखंड की जैव विविधता संपदा का आयुष व आयुर्वेद के शोधार्थी स्टार्टअप के रूप में लाभ प्राप्त करें। देश दुनिया में सूचना तकनीकी व बायोटेक्नोलॉजी में पूंजीगत व्यय कम है और आय अधिक से अधिक अर्जित की जा सकती है। उन्होंने भांग की खेती के लाभ गिनवाए व बताया कि अमेरिका ने पहले इसे प्रतिबंधित किया, लेकिन शोध के बाद उसके औषधीय गुणों के कारण वहां आज भांग को बढ़ावा दिया जा रहा हे। देश में मध्यप्रदेश पहला राज्य है जो भांग की खेती को वैधता प्रदान करने की तैयारी में है। क्योंकि भांग को नशे के रूप में नहीं उसके औषधीय गुण 'कैनेबिनोएड' प्राप्त करने के लिए किया जाना चाहिए। 

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उन्होंने अपने अनुभव और शोध के बारे में बताया कि उत्तराखंड में उपलब्ध खेती में से केवल 30 फीसद में यदि भांग की खेती की जाती है तो उत्तराखंड की प्रतिवर्ष 79 हजार करोड़ रुपये की आय अर्जित हो सकती है। डॉ. राजेंद्र डोभाल ने यूकॉस्ट के माध्यम से आयुर्वेद विवि को 20 लाख रुपये के प्रोजेक्ट दिलवाने की स्वीकृति प्रदान की। 

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Posted By: Raksha Panthari

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