देहरादून, जेएनएन। धरा को हराभरा बनाए रखने के लिए पौधरोपण जरूरी है। हर व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक पौधा जरूर रोपना चाहिए। लेकिन, युवाओं की पौधरोपण में कम दिलचस्पी या अवसर न मिल पाना दुखद है। देहरादून समेत पूरे गढ़वाल में पौधे लगाने की जिम्मेदारी बुजुर्गों के कंधों पर ही नजर आ रही है। युवाओं को पौधरोपण के महत्व का भान नहीं। यह कड़वी हकीकत 'दैनिक जागरण' की ओर से मंडल के सात जिलों में किए गए सर्वे में उजागर हुई। यहां अधिकांश युवाओं ने जीवन में कभी पौधरोपण नहीं किया। जबकि, 40 वर्ष से अधिक के लोगों ने जीवनकाल में कम से कम 20 से 50 पौधे रोपे हैं। हालांकि, पौधों के सर्वाइवल की स्थिति अधिकांश को नहीं पता।

पेड़ों के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं। इस बात का अहसास तो सभी को है, लेकिन घटती हरियाली के प्रति चिंता महज बातों में ही झलकती है। धरातल पर स्थिति चिंताजनक है। ऐसा भी नहीं कि पौधरोपण अभियान नहीं चल रहे हैं, पर इन्हें खानापूर्ति के लिए किया जाना दुखद है। यही कारण है कि हर साल लगाए जाने वाले हजारों पौधों में से महज 30 फीसद ही सर्वाइव कर पाते हैं।

पौधरोपण को बना चुके जीवन का लक्ष्य

सर्वे के दौरान कुछ ऐसे बुजुर्ग भी मिले, जो मिसाल पेश कर रहे हैं। उत्तरकाशी, टिहरी, पौड़ी में कुछ बुजुर्ग अब तक हजारों की संख्या में पौधे रोप चुके हैं और अधिकांश के संरक्षण का भी प्रयास करते हैं। ऋषिकेश और विकासनगर में भी 60 वर्ष से अधिक के कुछ बुजुर्गो ने कई सालों से पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उदाहरण पेश किए।

सर्वे में तीन आयु वर्ग शामिल

पौधारोपण को लेकर किए गए सर्वे में तीन आयु वर्ग निर्धारित किए गए थे, जिनमें एक 20 वर्ष से 35 वर्ष, दूसरा 36 वर्ष से 50 वर्ष और तीसरा आयु वर्ग 51 वर्ष से अधिक के लोग। इसमें पाया गया कि 20 से 35 वर्ष आयु वर्ग में केवल 10 फीसद युवाओं ने ही पौधे रोपे हैं। जबकि, 36 से 50 वर्ष के बीच के लोगों में से अधिकांश ने जीवन में कम से कम एक या दो बार पौधे लगाए। 51 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में अधिकांश लोगों ने जीवनकाल में कई दफा पौधारोपण किया। कुछ बुजुर्ग ऐसे भी मिले, जिन्होंने सैकड़ों पौधे रोपे हैं।

मैदानों जिलों में स्थिति चिंताजनक

राजधानी होने के साथ ही आबादी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण देहरादून में पौधारोपण की स्थिति तो ठीक है, लेकिन पौधों के सर्वाइव करने की दर बेहद कम। यहां सर्वे में शामिल किए गए 20 लोगों में से महज आठ लोग ऐसे थे, जिन्होंने पौधारोपण किया है। चौंकाने वाली बात तो यह कि पौधारोपण न करने वाले 12 लोगों में से नौ युवा थे। इसके अलावा बुजुर्गो में अधिकांश ने पौधे रोपे हैं। हरिद्वार में भी कमोबेश यही स्थिति है। यहां भी अधिकांश युवा ऐसे हैं, जो पौधारोपण नहीं कर सके हैं। हालांकि, युवाओं का यह कहना था कि वे पौधारोपण करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें अवसर नहीं मिला।

पहाड़ी जिलों में सर्वाइव कर रहे पौधे

सर्वे में यह भी स्पष्ट हुआ कि पर्वतीय जिलों में रोपे गए अधिकांश पौधे सर्वाइव कर जाते हैं। यहां भले ही बड़े पैमाने पर लोग पौधारोपण न करें, लेकिन अधिकांश पौधे सर्वाइव कर पेड़ के रूप में उद्देश्य पूरा करते नजर आते हैं। जबकि, मैदानों में स्थिति इसके उलट है। यहां पौधे रोपने के बाद लोग भूल जाते हैं।

हर जिले में 20 लोगों पर किया गया सर्वे

'दैनिक जागरण' की टीम ने गढ़वाल मंडल के सभी सात जिलों में विभिन्न आयु वर्ग के 20 लोगों के बीच सर्वे किया। लोगों से पूछा गया कि उन्होंने जीवन में पौधारोपण किया या नहीं। किया तो कितनी बार और उनके संरक्षण को क्या किया। साथ ही सर्वे में पुरखों के लगाए गए पौधों के संरक्षण और उनसे लाभ के बारे में भी पूछा गया।

यह भी पढ़ें: उत्तराखंड में हरियाली के लिहाज से कुछ सुकून, तो चिंताएं भी बढ़ीं; जानिए

फसल बीमा की दी जानकारी 

कृषि विभाग और सेंटर फॉर एरोमेटिक प्लांट ने सौड़ा सरोली ग्राम पंचायत में गोष्ठी की। विकासखंड प्रभारी वीके धस्माना, सहायक कृषि अधिकारी पीपी शैली, कैप के महेंद्र सिंह चौहान व बीमा कंपनी की ओर से दीपक ने फसल बीमा, लेमन ग्रास की खेती, जैविक खेती आदि की जानकारी दी। 

यह भी पढ़ें: सुकून भरी अबोहवा हुई गुजरे जमाने की बात, कंकरीट के जंगलों में गुम हो रही हरियाली

Posted By: Raksha Panthari

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस