गोपेश्वर, [देवेंद्र रावत]: चमोली जिले के जोशीमठ विकासखंड में चीन सीमा से लगी नीती व माणा घाटी रहने वाले भोटिया जनजाति के लोगों को देश की द्वितीय रक्षा पंक्ति का दर्जा हासिल है। लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र में शीत का प्रकोप बढ़ने के साथ ही ये सभी निचले स्थानों के लिए माइग्रेट होने लगते हैं। इन दिनों भी ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है।  द्वितीय रक्षा पंक्ति धीरे-धीरे खाली होने लगी है। जाहिर है ऐसी स्थिति में सीमा पर सेना की जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं। 

ये है भोटिया जनजाति का इतिहास

भोटिया हिमालयी लोग हैं, जो नौंवी शताब्दी या उसके बाद तिब्बत से दक्षिण की ओर उत्प्रवास करने वाले माने जाते हैं। इस जनजाति के लोगों को भोटिया, भोट और भूटानी भी कहा जाता है। भोटिया जनजाति के ज्यादातर लोग पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं। ये उत्तराखंड के तिब्बत से लगे सीमांत इलाकों के निवासी हैं। इनकी आबादी पारंपरिक रूप से पिथौरागढ जिले के धारचूला, मुन्स्यारी, डीडीहाट, बागेश्वर जिले के दानपुर क्षेत्र के साथ ही चमोली और उत्तरकाशी जिलों में समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में पाई जाती हैं। 

माइग्रेशन की ये है मजबूरी 

चमोली जिले के नीती और माणा घाटी के लोग शीतकाल में छह माह के लिए नंदप्रयाग, घाट, कर्णप्रयाग, गोपेश्वर, पीपलकोटी, दशोली, जोशीमठ आदि स्थानों पर चले जाते हैं। नीती-माणा घाटी में अत्याधिक बर्फबारी के चलते माइग्रेशन करना इनकी मजबूरी है। जबकि ग्रीष्मकाल के दौरान यही लोग उच्च हिमालय में रहकर चीन सीमा की निगरानी का कार्य भी करते हैं। 

सेना को मिलती है इनसे मदद 

काश्तकारी के लिए ये गांव से सीमा क्षेत्र की ओर आवाजाही करते रहते हैं। जिससे उन्हें सीमा क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों की पूरी जानकारी रहती है। उनकी यह जानकारी सेना व प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण भी साबित होती है। नीती घाटी के नीती, बाम्पा, बमशाली, फरकिया, मेहरगांव, कैलाशपुर, कोसा, जेलम, जुम्मा, द्रोणागिरी, कागा व गरपक और माणा घाटी के माणा, बेनाकुली सहित अन्य गांवों की दस हजार से अधिक की आबादी हर साल शीतकाल में माइग्रेट होकर अपने मवेशियों के साथ निचले स्थानों पर आ जाती है। इसके चलते नीती व माणा घाटी में सन्नाटा पसर जाता है और सेना को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है।

उत्सव से कम नहीं माइग्रेशन

भोटिया जनजाति के लोगों के लिए माइग्रेशन किसी उत्सव से कम नहीं है। वे पौराणिक रीति-रिवाज निभाते हुए पारंपरिक परिधानों में सज-धज कर निचले स्थानों की ओर आते हैं। इस दौरान गांवों में उत्सव का माहौल रहता है। शीतकालीन प्रवास पर लौटने के लिए उन्हें कई पड़ावों से होकर पैदल यात्रा करनी पड़ती है। पड़ावों में भी पारंपरिक पूजा-अर्चना के साथ लोकगीतों की गूंज रहती है।

उत्पादों का निचले स्थानों पर करते हैं व्यापार

भोटिया जनजाति के लोग ग्रीष्मकाल के दौरान नीती-माणा घाटी में नकदी फसल आलू, राजमा, चौलाई, फरण, सेब आदि का उत्पादन कर शीतकाल में निचले स्थानों पर इसका व्यापार करते हैं। भोटिया जनजाति का मुख्य व्यवसाय ऊनी उद्योग है। इस पौराणिक विरासत को वे आज भी जीवित रखे हुए हैं।

60 के दशक तक तिब्बत से होता था व्यापार

भोटिया जनजाति के लोग साठ के दशक से पूर्व तिब्बत के साथ व्यापार किया करते थे। इसके लिए दोनों ओर के व्यापारियों को एक-दूसरे के क्षेत्र में आने की अनुमति थी। लेकिन, 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया। 

लोक उत्सव के रूप में मनाते हैं आजादी का जश्न 

भारत-चीन सीमा पर लगभग 11 हजार की आबादी वाली जनजातीय बहुल चमोली जिले के नीति घाटी में स्वतंत्रता दिवस का जश्न लोक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। जो अपने-आप में देश प्रेम की अनूठी मिसाल है। नीती घाटी की छह ग्रामसभाओं के हर गांव में घर-घर पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और बिखर उठती है लोकरंग की अनूठी छटा।

प्रत्येक गांव से दुंफूधार तक भव्य झांकी के साथ प्रभातफेरी निकाली जाती है। 1947 से यह सिलसिला शुरू हुआ। नीती घाटी के लोग आज भी पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाते हैं। ठीक वैसा जैसा आजादी मिलने के बाद पहली बार मनाया गया था। वह भी बिना किसी सरकारी मदद के। यह ऐसा मौका है, जब पलायन के चलते गांवों में वीरान पड़े घर भी आबाद हो जाते हैं। 

भूटिया जनजाति की वेशभूषा 

भोटिया जनजाति के लोग रंगा(ऊनी अंगरखा), गैजू या खगचसी(ऊनी पायजामा), बांखें(ऊनी जूते), साली(पुली आभूषण), लक्ष्येप(अंगूठी या कड़ा) पहनते हैं।

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Edited By: Raksha Panthari