बदरीनाथ हेलीकॉप्टर हादसा: विशेषज्ञ लगा रहे दुर्घटना के कारणों को लेकर कयास, पक्षी के टकराने की भी जताई जा रही आशंका
बदरीनाथ धाम की हेली सेवा को आमतौर पर सुरक्षित माना जाता रहा है, लेकिन हालिया दुर्घटना ने इसकी सुरक्षा पर ...और पढ़ें


समय कम है?
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संवाद सहयोगी, जागरण गोपेश्वर (चमोली)। यदि शुक्रवार को हेली हादसे को अपवाद माना जाए तो श्री बदरीनाथ धाम की हवाई हेली सेवा अब तक सुरक्षित और बेदाग मानी जाती रही है।
केदारनाथ घाटी की बात करें तो बदरीनाथ का हेली ट्रैफिक दुर्गम घाटियों से थोड़ा अछूता है। देहरादून के सहस्त्रधारा से बदरीनाथ धाम तक की हेली यात्रा का अधिकत्तर हिस्सा अलकनंदा घाटी के ऊपर से गुजरता है।
अलकनंदा घाटी अपेक्षाकृत केदारनाथ के मंदाकिनी घाटी से न सिर्फ अधिक चौड़ी है बल्कि रुट के अधिकाशं हिस्से में ऊंचे या बड़े पहाड़ नहीं है इससे उड़ान विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय इलाके में हेलीकाप्टर के उड़ान के लिए ऐसी परिस्थितियां अनुकूल मानी जाती है।
हेली उड़ान की दृष्टि से अलकनंदा घाटी को देखा जाए तो बदरीनाथ धाम में लेंडिंग व उड़ान की दृष्टि के तहत अनुकूल और सुरक्षित मानी जाती है। इसकी वजह यह है कि यहां का हेलीपेड के लिए तीन तरफ से दरवाजे खुले हुए हैं।
एक नर पर्वत की तरफ थोडी ऊंचाई की वजह से थोड़ी कठिनाई तो जरुर है। लेकिन, पायलट आमतौर पर इससे बचते हुए लेंडिंग करते हैं। बदरीनाथ धाम से हेली उड़ान को बेहद सुरक्षित इसलिए भी माना जाता है, क्योंकि यहां उड़ान और लेंडिंग के लिए हवा की दिशा एकदम अनुकूल है।
यहां लेडिंग व उड़ान के चलते विपरीत दिशा में हवा की जरुरत होती है। बदरीनाथ से जब देहरादून के लिए हेली उड़ान भरता है तो उस समय जोशीमठ से बदरीनाथ धाम की तरफ बहने वाली तेज हवा उसके लिए सुरक्षित उड़ान का रास्ता तैयार करती है।
इसी प्रकार देहरादून से धाम की तरफ लेंडिंग करने वाली हेली को जोशीमठ से बदरीनाथ धाम तक बहने वाली तेज हवा पहाड़ियों से टकराकर लौटती है, जो लेंडिंग के लिए अनुकूल बनाती है।
बदरीनाथ के चार्टर्ड हवाई सेवाओं के एक दशक के दौरान 10 जून 2017 को बदरीनाथ धाम के हेलीपैड पर क्रेस्टल एविएशन का हेलीकॉप्टर उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। अगस्ता-119 हेलीकॉप्टर बदरीनाथ से हरिद्वार के लिए रवाना होने वाला था।
उड़ान भरते समय संतुलन बिगड़ने से हेलीकॉप्टर नीचे गिर गया था। इस हादसे में चालक दल के इंजीनियर विक्रम लांबा की रोटर ब्लेड की चपेट में आने से मौत हो गई थी, जबकि दोनों पायलट घायल हुए थे। हेलीकॉप्टर में सवार पांचों यात्री सुरक्षित बच गए थे।
तो फिर कैसे हुआ हादसा
शुक्रवार को हुए हेली हादसे को लेकर कोई स्प्ष्ट कारण सामने नहीं आ पाया है। जांच टीम भी हवाई निरीक्षण कर लौट गई है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि हादसे का असली कारण क्या हो सकता है। इसको लेकर हेलीकॉप्टर उड़ान के कई दिग्गज विशेषज्ञ दो तरह का अनुमान लगा रहे हैं।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शुक्रवार को वर्षा व बादल भरे मौसम की वजह के चलते पायलेट ने अलकनंदा नदी के सहारे अपनी उड़ान को जारी रखा होगा, पहाड़ी और घाटी के क्षेत्र में पायलट इस सुरक्षित विकल्प को अजमाते हैं। यदि मौसम खराब हो तो व नदियों के सहारे अपनी उड़ान को आगे बढा़ते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसी दौरान किसी पर्वतीय मोड के पास अचानक से धुंध या बादल का गुब्बार आया और पायलट आगे का रास्ता भटक गया। वहीं पहाड़ में हेली उड़ान का लंबा अनुभव रखने वाले कुछ पायलेटों का मानना है कि रास्ते में किसी पक्षी के टकराने के चलते हेलीकॉप्टर अनियंत्रित हो गया।
पक्षी से टकाराने की स्थिति में हेलीकाप्टर नीचे की ओर गोता लगाने लगता है। कल की दुर्घटना में भी हेलीकॉप्टर के तीन बार गोते लगाने की बात बताई जा रही है। गौरतलब है कि दुर्घटनाग्रस्त स्थल हिमालयी गिद्दों का प्राकृतिक आवास रहा है।
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