संवाद सहयोगी, गोपेश्वर: गैरसैंण में प्रस्तावित विधानसभा सत्र में इस बार विधायक हो या मंत्री या फिर अधिकारी वे पारंपरिक गोल टोपी पहने नजर आएंगे। पारंपरिक टोपी बनाने के लिए सरकार से पारंपरिक वस्त्रों को बनाने के काम में लगे कारीगर को 100 टोपियां बनाने का जिम्मा सौंपा गया है।

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र की पारंपरिक टोपी के रूप में जानी जाने वाली गोल टोपी इस बार विधानसभा सत्र के दौरान मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायकों व अधिकारियों के सिर की शोभा बढ़ाएगी। गैरसैंण में नौ जून से प्रस्तावित तीन दिवसीय विधानसभा सत्र में शामिल लोगों को यह टोपी सरकार की तरफ से भेंट की जाएगी। गोल टोपी को बनाने का जिम्मा गोपेश्वर के हल्दापानी में गढ़वाली परिधानों पर काम कर रहे कैलाश को सौंपा गया है। कैलाश उत्तराखंड के लोक कलाकारों के लिए गढ़वाल के पारंपरिक वस्त्रों को बनाने का काम वर्षो से करते आ रहे हैं। विधानसभा उपाध्यक्ष डॉ.अनुसूया प्रसाद मैखुरी ने उन्हें कभी गढ़वाल की पहचान रही गोल टोपी बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है।

पारंपरिक है टोपी

गोल टोपी गढ़वाल की पारंपरिक टोपी मानी जाती रही है। इस टोपी की खास बात यह है कि इसमें एक पाथा अनाज (दो किलो अनाज तोलने का बर्तन)17वीं से 18वीं सदी तक इस टोपी का प्रचलन पहाड़ों में अनाज के आदान प्रदान के लिए किया जाता रहा था। तब पाथा, सेर, माणा, तामी जैसे गढ़वाली मापक यंत्र नहीं थे। टोपी से नापकर ही सामग्री खरीदी, बेची जाती थी।

गढ़वाल राइफल के ब्रासबैंड में यही गोल टोपी गढ़वाल रायफल के जवान पहनते हैं। बीसी गब्बर सिंह, दरबान सिंह हो या फिर समाजसेवी लेखक विशेश्वर दत्त चंदोला, सुमाणी के पंथ्या दादा सहित नामी गिरामी लोगों के सिर की शोभा इसी गोल टोपी ने बढ़ाई थी।

ये भी पहनते हैं गोल टोपी

पदमश्री डॉ.शेखर पाठक, गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट, लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी सहित नामी गिरामी लोग।

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