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    वाराणसी के सारनाथ में धमेख स्तूप की लौटेगी रंगत, तीन माह बंद रहेगा लाइट एंड साउंड शो

    By Saurabh ChakravartyEdited By:
    Updated: Sun, 22 Aug 2021 11:36 AM (IST)

    महात्मा बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ में दरकती धरोहरों का रंग फिर से चटख होने लगा है। गुप्तकालीन अवशेष पंचायतन मंदिर के संरक्षण का कार्य पूरा हो चुका है तो प्राचीन मूलगंध कुटी अवशेष के संरक्षण का कार्य चल रहा है।

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    महात्मा बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ में दरकती धरोहरों का रंग फिर से चटख होने लगा है।

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। महात्मा बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ में दरकती धरोहरों का रंग फिर से चटख होने लगा है। गुप्तकालीन अवशेष पंचायतन मंदिर के संरक्षण का कार्य पूरा हो चुका है तो प्राचीन मूलगंध कुटी अवशेष के संरक्षण का कार्य चल रहा है। अब धमेख स्तूप की रंगत लौटाने की तैयारी है। इसके लिए स्तूप की दीवार पर दिखाया जाने वाला लाइट एंड साउंड शो तीन माह बंद रहेगा। इसके लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से पर्यटन विभाग को पत्र लिख कर जानकारी दे दी गई है।

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    दरअसल, पुरातात्विक खंडहर परिसर में गुप्त कालीन अवशेषों की कलाकृतियां व दीवारों की ईंटें जीर्ण-शीर्ण हो गई थीं। समुचित देख-रेख का अभाव तो था ही जीर्णोद्धार में भी मानक अनुरुप कार्य न किए जाने से स्थिति बिगड़ती चली गई थी। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से इसका नए सिरे से जीर्णोद्धार कराया जा रहा है। पंचायतन मंदिर की कलाकृतियां व ईटें नोना लगने से लगभग समाप्त हो चुकी थीं। उनकी जगह पर उसी स्वरूप की कलाकृतियों से युक्त ईंट बनवा कर लगा दी गई हैं। इससे वह अब अपने मूल स्वरूप में आ गया है। प्राचीन मूलगंध कुटी अवशेष के संरक्षण का कार्य चल रहा है। इसकी दीवारें जगह-जगह क्षतिग्रस्त होने के साथ कुछ ईंट भी गल कर नष्ट हो चुकी हैं। अब उनकी जगह पर उसी नाप व स्वरूप की ईंट लगाई जा रही हैैंं। इसमें लगभग एक दर्जन मिस्त्री-मजदूर काम कर रहे हैं।

    चूना-गुड़-सुर्खी व बेल के गूदे से संवार रहे धरोहर

    संरक्षण कार्य में सीमेंट-बालू की जगह सुर्खी-चूना, गुड़, बेल का चूरन आदि सामग्री को मिला कर जोड़ाई के लिए मसाला तैयार किया जा रहा है। इसके लिए इन सभी सामग्री को तीन अलग-अलग टंकियों में पानी में भिगो कर एक सप्ताह तक सड़ाया जा रहा है। उसके बाद इसे जोड़ाई में प्रयोग किया जा रहा है। इसका ध्यान रखा जा रहा है कि इसे देख कर लोग भ्रमित न हों। एएसआइ सारनाथ मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद डा. नीरज कुमार सिन्हा ने बताया कि सभी दीवारें गुप्त काल की बनी हुई हैं। उस समय सीमेंट-बालू का प्रयोग नहीं होता था। इसलिए उनका प्रयोग नहीं किया जा रहा है। धमेख स्तूप संरक्षण के लिए लाइट एंड साउंड सिस्टम तीन माह बंद करना होगा। इसके लिए पर्यटन विभाग को सूचना दे दी गई है।