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    Varanasi News : शंखनाद से पाणिनि कन्या महाविद्यालय के तीन दिवसीय स्वर्ण जयंती दीक्षा समारोह शुरू

    By Saurabh ChakravartyEdited By:
    Updated: Fri, 03 Jun 2022 11:29 AM (IST)

    पाणिनि कन्या महाविद्यालय (महमूरगंज) का तीन दिवसीय स्वर्ण जयंती दीक्षा समारोह का आगाज शुक्रवार को शंखनाद से हुआ । इस मौके पर 50 छात्राओं ने संध्योपासना के बाद बृहद यज्ञ हुआ। दीक्षा लेने वाली छात्राओं ने भी वैदिक ज्ञान के दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाने का संकल्प लिया ।

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    पाणिनि कन्या महाविद्यालय का तीन दिवसीय स्वर्ण जयंती दीक्षा समारोह का शुभारंभ शुक्रवार को शंखनाद से हुआ ।

    जागरण संवाददाता, वाराणसी : पाणिनि कन्या महाविद्यालय (महमूरगंज) का तीन दिवसीय स्वर्ण जयंती दीक्षा समारोह का शुभारंभ शुक्रवार को शंखनाद से हुआ। इस मौके पर 50 छात्राओं ने संध्योपासना के बाद बृहद यज्ञ हुआ। आर्य कन्या विद्यापीठ (नजीबाबाद ) की प्राचार्या डा. प्रियवंदा वेदभारती बकायदा छात्राओं का समावर्तन संस्कार कराया । इस दौरान यहां से डिग्री हासिल करने वाली छात्राओं को समाज के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध कराया गया । वहीं यहां से दीक्षा लेने वाली छात्राओं ने भी वैदिक ज्ञान के दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाने का संकल्प लिया ।

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    इस क्रम में गुरुकुलीय शिक्षा की उपयोगिता पर बोलते हुए वक्ताओं ने कहा कि गुरुकुल शिक्षा वैदिक काल से ही चली आ रही है। गुरुकुल का अर्थ है वह स्थान या क्षेत्र, जहां गुरु का कुल यानी परिवार निवास करता है। प्राचीन काल में शिक्षक को ही गुरु या आचार्य मानते थे और वहां शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को उसका परिवार माना जाता था। वही अब शिक्षा व्यावसायिक होती जा रही है । इसके चलते हमारी शिक्षा व्यवस्था अपने मूल उद्देश्यों से भटकती जा रही है ।मुख्य अतिथि ठाकुर विक्रम सिंह ने कहा कि हमें गुरुकुल पद्धति की ओर लौटने की जरूरत है । महाविद्यालय की प्राचार्या नंदिता शास्त्री ने कहा कि वेदों द्वारा हमें भारतीय संस्कृति, सभ्यता, जीवन और दर्शन का ज्ञान होता है। वेद हमारी वह थाती हैं, जो मानव जीवन के लक्ष्य को अपने में संजोये हुए हैं। वैदिक काल का विस्तार ईसा पूर्व 2500 से लेकर 500 ई. पूर्व तक माना जाता है।

    इस काल में शिक्षा पर ब्राह्मणों का आधिपत्य था। अत: वैदिक कालीन शिक्षा को’ब्राह्मण शिक्षा एवं हिन्दू शिक्षा’ की संज्ञा भी दी जाती है। वैदिक साहित्य में शिक्षा शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है। यथा-‘विद्या’,’ज्ञान’, ‘बोध’ तथा ‘विनय’। यहां छात्राओं को धर्मशास्त्र की पढाई से लेकर अस्त्र की शिक्षा भी सिखाई जाती है।

    योग साधना और यज्ञ के लिए गुरुकुल को एक अभिन्न अंग माना जाता हैI गुरु के महत्व को प्रतिपादित करने के लिए कहाकि गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर, गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:| अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं। उपनिषदों में लिखा गया है कि मातृ देवो भवः ! पितृ देवो भवः ! आचार्य देवो भवः ! अतिथि देवो भवः ! । वैदिक शिक्षा संगोष्ठी में बीएचयू के प्रो . गोपबन्धु मिश्र, विशिष्ट अतिथि संस्कृत विवि के डा. हरिप्रसाद अधिकारी, डा. महावीर अग्रवाल, जगदीश शर्मा, श्दीपा शर्मा सहित अन्य लोगों ने विचार व्यक्त किया। संयोजन आचार्य वाचोनिधि व धन्यवाद ज्ञापन डा. माधवी तिवारी ने किया ।