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    ठीकेदार ने दगा दिया तो घोड़ा गाड़ी बना सहारा, हाइवे पर टिक-टिक करते बिहार से निकल पड़े घर

    By Saurabh ChakravartyEdited By:
    Updated: Mon, 15 Jun 2020 05:34 PM (IST)

    बिहार में काम कर रहे दिनेश दयाराम व राजेश को ठीकेदार ने दगा दिया तो वे घोड़ा गाड़ी पर ही सामान रख प्रतापगढ़ के महराजपुर के लिए निकल पड़े।

    ठीकेदार ने दगा दिया तो घोड़ा गाड़ी बना सहारा, हाइवे पर टिक-टिक करते बिहार से निकल पड़े घर

    वाराणसी, जेएनएन। साहब, जौन घोड़ा गाड़ी पर ईंट ढोके आपन व परिवार के लोगन क पेट भरत रहली, लॉकडाउन में आज वहीं घोड़ा गाड़ी मुश्किल समय में घर क दूरी तय करे क सहारा बन गईल। ठीकेदार द्वारा जबाब देहले पर पेट भरह वाला घोड़ा ही आज हम लोगन क सहारा बन घर पहुंचावत बा। कोरोनवा पेटे पर जरूर लात मार देहलस पर हम लोगन क हिम्मत ना तोड़ पइले हव। हाइवे पर राने चट्टी के पास सोमवार की सुबह घर जा रहे तीन श्रमिकों ने कुछ इस कदर अपनी दर्द बयां किया।

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    काम बंद होने पर गांव के मांटी की याद आई

    कोरोना महामारी के बीच हुए लॉकडाउन में बिहार-छपरा के मकेर में स्थित ईंट भट्ठे पर घोड़ा गाड़ी से कच्चे ईंट की ढुलाई करने वाले दिनेश यादव, दयाराम यादव व राजेश सरोज नामक श्रमिक भट्ठे पर काम बंद होने से असहाय हो गए। ठीकेदार व मालिक ने कह दिया कि घर जाओ। जब साधन की मांग किए तो लॉकडाउन का हवाला देकर जबाब दे दिया कि कोई साधन नहीं है। काम बंद होने पर मजबूरन गांव के मांटी की याद आई। साधन न मिलने पर मरता क्या न करता, आखिरकार घोड़ा गाड़ी पर ही सामान रख टिक-टिक करते प्रतापगढ़ के महराजपुर के लिए निकल पड़े।

    अब तो बस घर दिख रहा है...

    रास्ते मे बनाकर कुछ अपने खाते और बेजुबानों के भी चारा की व्यवस्था करते। श्रमिकों ने बताया कि काम पर ले जाते समय ठीकेदार हम लोगों के साथ ही घोड़ी गाड़ी को ट्रक से ले गया था। बिहार में घोड़ा गाड़ी को 'टमटम' व प्रतापगढ़ में 'बुग्गी' कहते है। इसी के सहारे हाइवे की दूरी माप कर घर पहुंच जाएंगे और अब इतनी दूर काम करने नही आएंगे। अब तो बस घर दिख रहा है...। विगत 35 वर्ष से हम लोग यह काम करते चले आ रहे है पर ऐसी विपत्ति कभी नही आई थी। हाइवे पर अभी कुछ दिन पूर्व इसी तरह प्रयागराज-नवाबगंज के रहने वाले रामफल, पवन व हरिकेश भी ठीकेदार द्वारा दगा देने पर बिहार के गया से घोड़ा गाड़ी को ही सहारा बना घर के लिए निकल पड़े थे।