वाराणसी, जेएनएन। काशी शिव की नगरी है। वेद, शास्त्र, पुराणों द्वारा इसे भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी हुई नगरी स्वीकार किया गया है। रामेश्वर, काशी पंचक्रोशी के तृतीय पड़ाव स्थल पर बसा हुआ है जहां भगवान श्रीराम द्वारा पंचक्रोशी यात्रा में आने पर वरुणा नदी के एक मुठ्ठी रेत से शिवलिंग स्थापना की और भगवान शिव एवम् राम के आरम्भिक मिलन होने से अब इसे रामेश्वर महादेव (रामेश्वर तीर्थ धाम) के नाम से जाना जाता है। श्रावण मास में काशी के सभी शिवालयों में श्रद्धालुओंं की भीड़ उमड़ती है। आध्यात्मिक दृष्टि से विविध रूपों में शिव एक ही सत्ता के साथ विराजमान हैं, पर लौकिक दृष्टि से प्रत्येक शिव स्थान या शिवालय के साथ अलग -अलग परम्पराएँ जुडी हैं जो लोक आस्था का प्रतीक हैंं।

भगवान राम से संबंधित आस्‍था का यह केंद्र अब लाेक पर्व और आस्‍था का बड़ा केंद्र है और रामेश्‍वरम न जा पाने वाले रामेश्‍वर आकर पुण्‍य प्राप्‍त करते हैं। 

पापोंं के विनाश के लिए पंचक्रोशी यात्रा की शुरुआत हुई जब भगवान श्री राम ने कुम्भोदर ऋषि से महा विद्वान् रावण के वध से प्रायश्चित उपाय पर चौरासी कोस की यात्रा करने क्षत्रिय वंश द्वारा ब्राह्मणों की मर्यादा को स्थापित रखने के आदेश पर चौरासी कोस की काशी यात्रा (जहाँ 56 करोड़ देवता वास करते हैं) प्रारम्भ की। कर्दमेश्वर, भीमचण्डी के बाद रामेश्वर में वरुणा के शांत कछार पर रात्रि भर विश्राम कर भगवान राम ने अपने हाथोंं मेंं एक मुठ्ठी रेत से शिवलिंग की स्थापना कर तर्पण किया, जो स्थान आज पापों का नाश और मनोकामना के पूर्ण का पवित्र स्थल बन गया। यहांं प्रति वर्ष लाखोंं लोग आस्था के साथ जलाभिषेक कर पूजन -अर्चन करते हैं। 'काशी महात्‍म्‍य' में उल्लिखित कथा के अनुसार -'एक रात्रेय तू मध्येय प्रविशे छुछि मानसः, वरुणा यासि तटे रम्ये सजाति परमां गतिम्।' 

रामेश्वर में दिन -रात रुकने पर खाने, पहनने, धोने, शौच जाने, तामसी भोज्य पदार्थ त्याग, जूते चप्पल पहनने, तेल का पूर्ण त्याग कर वरुणा के तट पर अर्पण और देव स्थान पर सफेद तिल, बेलपत्र, सफेद वस्त्र, चांदी सोना और गंगा जल चढ़ाकर तर्पण करता है, शिवलिंग स्थापना पर उसे परम् गति (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। इस आधार पर सभी ग्रहों ने आकर शिवलिंग की स्थापना की है। राजा नहुष ने नहुषेश्वर ,पृथ्वी आकाश के मालिक द्वारा द्यावा- भूमिश्वर, भरत जी द्वारा भरतेश्वर सहित पंचपालेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, शत्रुघ्नेश्वर, अग्निशेश्वर, सोमेश्वर की स्थापना के साथ परिसर में दत्तात्रेेय, राम लक्ष्मण जानकी, हनुमान, गणेश, नरसिंह, कालभैरव, सूर्यदेव एवम् साक्षी विनायक मन्दिर के बाहरी हिस्से में स्थित है।

वैष्णव सम्प्रदाय में राधा -कृष्ण मन्दिर, आराध्य देवी माँ तुलजा -दुर्गा की भव्य प्रतिमा, बहरी अलंग झारखंडेश्वर महादेव, श्मशान घाट, रुद्राणी, तपोभूमि, उतकलेश्वर महादेव, उदण्ड विनायक और इश्वरेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थापित है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा वरुणा तट पर जहांं शिवलिंग की स्थापना की गई,वहीँ पर वीर हनुमान व् असंख्य बन्दरोंं ने विंध्य पर्वत की सिला से असंख्य लिंग की स्थापना श्री राम के आदेश पर किया जो तप स्थली के रूप में विशाल वट के नीचे आस्था का केंद्र है। भगवान श्री राम के पगधूलि से यह स्थल श्रीराम मय हो गया।

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