कालापानी की ऐतिहासिक गाथा के सर्जक क्रांतिवीर रामचरण लाल शर्मा को 30 वर्ष के कठोर कारावास की मिली थी सजा
अपनी निर्भीक संपादकीय दृष्टि और लेखकीय प्रतिरोध से क्रांतिवीरों और जनमानस में स्वाभिमान और स्वावलंबन की भावना जगाने वाले स्वतंत्रता सेनानी रामचरण लाल शर्मा के साहसिक पराक्रम का लेखा-जोखा एक खबर में पढ़िए और महसूस कीजिए क्रांति के एक युग को।
डा. सुरेन्द्र अग्निहोत्री, लखनऊ, उत्तर प्रदेश। भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता में अपनी प्रतिरोध की शानदार परंपरा पर गर्व करना चाहे तो सबसे पहले ध्यान आता है इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से सन् 1907 में प्रकाशित हुए 'स्वराज' का। ये उग्र तेवर वाला अपनी तरह का साप्ताहिक समाचार पत्र था। भारतीय इतिहास में शायद ही कोई दूसरा पत्र हो, जिसके एक-एक करके आठ संपादकों ने विदेशी सत्ताधीशों के आगे झुकने से इन्कार कर दिया। परिणाम स्वरूप उन सभी को कुल मिलाकर 125 वर्ष की सजाएं सुनाई गई हो।
शांति नारायण ने जिस दिन 'स्वराज' निकाला, उसी दिन से उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के बाद के लिए एक अन्य संपादक की तलाश शुरू कर दी थी। 'स्वराज' के पहले पेज में उन्होंने एक विज्ञापन देना शुरू किया जो उसके हर अंक में छपता था। उस विज्ञापन के शब्द थे, 'स्वराज' के लिए एक एडिटर चाहिए जो अंग्रेजी और उर्दू का विद्वान हो, उसका एक पैर 'स्वराज' के दफ्तर में हो और दूसरा जेल में हो। तनख्वाह जौ की दो रोटी और एक प्याला पानी, इससे ज्यादा जो उसकी तकदीर में हो।' उन्ही संपादकों की श्रृंखला के नायक क्रांतिवीर रामचरण लाल शर्मा का नाम आदर के साथ आता है।
क्रांतिवीर रामचरण लाल शर्मा ने आजादी की दीप शिखा को प्रज्जवलित करते रहने के लिए अंग्रेजी साम्राज्य के दमन की पराकाष्ठा के बीच अपने आप को टूटने से बचाने के लिए और देशवासियों को अधिक गहराई से स्वाधीनता आंदोलन के उस अध्याय से परिचित कराने के लिए डायरी में जो कुछ दर्ज किया वह जीता जागता इतिहास आज 'पहले काला पानी की कहानी' (काला पानी का ऐतिहासिक दस्तावेज) के रूप में उपलब्ध है। अंडमान के जेल जीवन का विस्तृत ब्योरा को पढ़े बिना स्वतंत्रता संग्राम की कथा अधूरी है।
इस महागाथा के लेखक और भुक्तभोगी क्रांतिवीर रामचरण लाल शर्मा का जन्म सन् 1886 में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के उरू नगला गांव में हुआ था। 'स्वराज' में ब्रिटिश शासन विरोधी एक कविता के प्रकाशन तथा अन्य मामला बनाकर उन पर मुकदमा चला सन् 1909 मार्च में एटा सेशन जज ने रामचरण लाल शर्मा को धारा 120 बी 121ए तथा 124ए के अंतर्गत 30 साल के कठोर कारावास का दंड दिया था।
अदालत से चलते वक्त मजिस्ट्रेट के सामने यह शेर पढ़ा-
'आह! सय्याद तू आया मेरे पर काटने को,
मैं तो खुश था कि छुरा लाया है सर काटने को।'
गौरतलब है कि रामचरण लाल शर्मा पर तीनों सजाएं साथ-साथ चलने का भी आदेश था। जिसके कारण 10 वर्ष के भीतर सजा पूरी हो जाने को थी। मुकदमा भी पूरा नाटकीय था, पहली दोनों धाराओं का अपराध सिद्ध करने के लिए उरू नगला गांव के आस-पास के गांवों सेे 4-5 गवाह पेश किए गए थे, जिन्होंने गवाही में कहा शर्मा जी ने हमसे कहा कि हम बम बनाते हैं, अंग्रेजों ने हमारे देश पर कब्जा कर लिया है। अत: तुम हमारी पार्टी के सदस्य हो जाओ ताकि उन्हें मार कर निकाल दें।
इन गवाहों में एक जमींदार थे और तीन उनके नौकर थे। 'स्वराज' बंगाल से निकलने वाले 'युगांतर' पत्र की परंपरा पर चल रहा था। 'स्वराज' में अंग्रेजों को मार भगाने के संबंध में खुले लेख होते थे बम बनाने के नुस्खे भी छपते थे। 'स्वराज' के संपादक को सजा होने के बाद प्रेस एक्ट बना था, जिसके अंतर्गत पत्र प्रकाशन से पूर्व घोषणा पत्र डिक्लेरेशन दाखिल करने की आवश्यकता तथा जमानत तक लेने की व्यवस्था की गई थी। इसी एक्ट के अनुसार 'स्वराज्य' प्रेस को सरकार ने जब्त कर लिया था और फिर उसका प्रकाशन बंद हो गया था।
एटा जेल में कुछ समय तक रखने के बाद श्री शर्मा जी को कुछ दिन फतेहगढ़ में रखा गया और फिर अलीपुर की जेल को भेज दिया गया। यहां से अन्य क्रांतिकारी-राज-बंदियों के साथ इन्हें अंडमान भेजा गया। राज बंदियों के लिए वहां से भारत में पत्र भेजना आसान नहीं था। अंग्रेजी राज्य में डाक सेंसर की जाती थी, जेल की शिकायत की कोई चि_ी बाहर नहीं भेजी जा सकती थी, अत: शर्मा जी ने एक जेल वार्डर को इस बात के लिए राजी किया कि वह उनकी चि_ी को लेकर कलकत्ता (अब कोलकता) चला जाए और वहां 'अमृत बाजार पत्रिका' कार्यालय में दे दे। अमृत बाजार पत्रिका ही इतना साहस कर सकती थी कि अंडमान जेल में राज बंदियों पर होने वाले अत्याचारों का ब्यौरा छाप दे और यही हुआ। बड़े मोटे हेडिंग में पत्रिका में राज बंदियों पर होने वाले अत्याचारों की खबर छपी, जिससे देश में नहीं सारे सरकारी क्षेत्र में सनसनी फैल गई। चार वर्षों बाद वहां से नागपुर के केंद्रीय कारागार ले आए गए। इस जगह रहकर जेल अधिकारियों से उनका जबरदस्त संघर्ष हुआ। सन् 1918 में जब रामचरण शर्मा जेल से छूटे तो दिल्ली में 'कांग्रेस' व 'फतह' नाम के दो दैनिक पत्रों का संपादन संभाल लिया। फिर जबलपुर जाकर 'तिलक' हिंदी दैनिक से जुड़ गए।
इसी काल में बहादुरगढ़ और रोहतक में ब्रिटिश विरोधी भाषण देने के कारण पंजाब पुलिस उनके पीछे लग गई। क्रांतिकारी डा. मुन्जे ने उन्हें किसी तरह नागपुर भेज दिया। यहां उनका संपर्क हुआ पं. माखनलाल चतुर्वेदी से तब तक रामचरणलाल जी को पकडऩे के लिए पुरस्कार घोषित हो चुका था अत: वह चतुर्वेदी जी के कहने पर पांडिचेरी चले गए। उनका नाम कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र एवं मेरठ षड्यंत्र में एम.एन. राय के साथ अंग्रेजी पुलिस ने जोड़ा था। पांडिचेरी (अब पुडुचेरी) अंग्रेजी शासन की सीमा से बाहर था, फिर भी एक बार सरकार द्वारा उन पर कड़ी निगरानी रखी गई, उनके पत्रों को सेंसर किया गया। बावजूद इसके वे निरंतर लिखते और बोलते रहे। उन्होंने कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया जिनमें एक 'स्कर्ज आफ क्राइस्ट' उल्लेखनीय है। यह राजस्थान के नेता बाबा नरसिंह दास पर थी, लेकिन छप नहीं सकी।
सन् 1930 में रामचरण लाल जी अस्वस्थ हो गए। पैर में कील चुभ जाने से जो घाव हुआ वह गैंग्रीन बन गया। पांडिचेरी (अब पुडुचेरी) में लाभ होते न देख मद्रास (अब चेन्नई) के गवर्नर से वहां इलाज कराने की अनुमति मांगी गई। वे पांडिचेरी पुलिस के पहरे में मद्रास अब चेन्नई के सदर अस्पताल लाए गए जहां क्लोरोफार्म सुंघाकर उनकी टांग काट दी गई। फरवरी 1931 में यह क्रांतिवीर अंतिम क्षणों तक परिस्थितियों और मृत्यु से जूझते हुए समाप्त हो गया। स्वतंत्रता के रजत जयंती वर्ष 1972 में दादा पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने प्रयास करके युद्धवीर सिंह जी से प्राप्त रामचरण लाल शर्मा द्वारा लिखी अंडमान-कथा को प्रकाशित करा दिया था। इसके द्वारा आज हम स्वाधीनता आंदोलन के उस सच से अधिक गहराई से परिचित हो पाते हैं जिसकी कल्पना भी हमारे लिए दुष्कर है। काला पानी की यह कहानी एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जो युगों-युगों तक भारतवासियों को देश पर न्योछावर होने वाले वीरों की याद दिलाता रहेगा।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।