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    काशी का ट्रैफिक अतिक्रमण से बेजार, हाथ से हाथ जुड़ें तो मिल पाएगी रफ्तार, इस तरह से न‍िकलेगा समाधान

    By PRAMOD KUMAR YADAVEdited By: Abhishek sharma
    Updated: Sun, 30 Nov 2025 12:25 PM (IST)

    वाराणसी में अतिक्रमण की समस्या से यातायात बुरी तरह प्रभावित है। संकरी सड़कों पर अवैध कब्जों के कारण जाम लगना आम बात है। नागरिकों और प्रशासन को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा ताकि शहर में यातायात सुचारू हो सके। अतिक्रमण हटाने और नियमों का पालन कराने से स्थिति में सुधार हो सकता है।

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    वाराणसी शहर जाम के झाम में अकसर फंसा नजर आता है।

    प्रमोद यादव, जागरण, वाराणसी। काशी धर्म-अध्यात्म एवं पर्यटन की नगरी। मूर्त-अमूर्त धरोहरों को समेटे-सहेजे यह शहर पूर्वांचल की शिक्षा-चिकित्सा का केंद्र तो अर्थव्यवस्था की भी धुरी है। इस तरह कह सकते हैं प्रदेश के समूचा पूर्वी क्षेत्र और पश्चिमी बिहार तक के लिए इलाज, खरीदारी-व्यापार समेत हर जरूरत की पूर्ति का आधार है यह नगरी।

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    गंगा स्नान, बाबा विश्वनाथ के दर्शन-ध्यान, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विद्याध्ययन के लिए तो पूरे देश ही नहीं विदेश से भी लोग आते हैं। इस नगरी की 40 लाख आबादी के साथ ही दस-पांच लाख अक्सर इस शहर में विविध कार्यों से आते-जाते हैं। यह लोड झेल पाने में प्राचीन नगरी की सड़कें असहाय नजर आती हैं।

    हाल के वर्षों में सड़कों का चौड़ीकरण जरूर हुआ, लेकिन सिस्टम डेवलप न होने से सब किया, धरा रह जाता है। अतिक्रमण बेजार करता है और दिन रात यहां वहां लगा जाम शहर की अर्थव्यवस्था को बीमार करता है। गौर करें तो शहर की कोई सड़क न होगी जहां दुकान अपनी हद से आगे बढ़ी पाथवे घेरे नजर न आती है।

    उसके आगे ठेला-खोमचा और फिर ग्राहक के वाहन से चलने के लिए सड़क आधी रह जाती है। बड़े-बड़े शोरूम लेकिन पार्किंग के लिए दो फीट नहीं छोड़ते। अंडर ग्राउंड बन भी गया तो मानक व नियम तोड़ते हैं। चौराहों पर 100 मीटर तक वाहन खड़े करने पर पाबंदी लेकिन व्यवस्था को मुंह चिढ़ाते वाहनों की कतार प्रमुख चौराहों पर ही सर्वाधिक नजर आती है।

    सड़कें जहां कहीं अतिक्रमण से बची भी हैं वहां भी वाहन शायद ही रफ्तार भर पाएं, कारण रसूख के बल पर यहां-वहां मनमाने तरीके से बनाए गए कट और इनसे कौन कब मुड़े और हादसा कर जाए। एक दशक में इस पर हजारों करोड़ खर्च किए जा चुके लेकिन सिग्नल तक के नाम पर लाल-हरी बत्तियों का छलावा ही सामने आता है।

    सिविक सेंस की कमी कह सकते हैं कि इन बत्तियों के बाद भी डंडा लिए चार-छह पुलिसकर्मी न खड़े हों तो वाहनों का रेला मनमाने तरीके से पार होता जाता है। बेशक, पुलिस-प्रशासन, विकास प्राधिकरण व नगर निगम में इच्छा शक्ति की कमी है, लेकिन इसमें जिम्मेदार शहरवासियों का वह हिस्सा भी है जो अपनी थोड़ी सी सुविधा के लिए पूरे सिस्टम को दुविधा में डालता है। 

    हम सब मिल कर बनाएं आवागमन की राह सुगम इन अव्यवस्थाओं की ओर हर एक का ध्यान आकर्षित करने के लिए दैनिक जागरण सोमवार से अभियान शुरू करने जा रहा है। इसमें हर खबरों के रूप में तो आपके साथ होंगे ही विविध गतिविधियों के जरिए आपके बीच भी आएंगे। हम सब मिल जुल कर सुगम आवागमन की राह बनाएंगे।