Varanasi में गढ़वाल राजाओं की विशिष्ट धरोधर है कर्दमेश्वर महादेव मंदिर, नागर स्थापत्य कला की झलक
कर्दमेश्वर महादेव मंदिर पूर्व मुखी है। इस मंदिर में कर्दम ऋषि ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इसलिए इस मंदिर का नाम कर्दमेश्वर पड़ा। मंदिर में एक बड़ा कुंड भी है। जिसका नाम कर्दम कुंड है। मान्यता है कि इस सरोवर का निर्माण कर्दम ऋषि के आंसूओं से हुआ था।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। भगवान शिव के त्रिशुल पर टिकी काशी दुनिया के अन्य शहरों से बिल्कुल अलग अद्भुत और अलौकिक है। यहां स्थापित सबसे प्राचीन मंदिर कर्दमेश्वर मुगलों की आखिरी निशानी है। मान्यता है कि यह काशी का सबसे पुराना मंदिर है। कंदवा गांव में स्थित होने के कारण इस मंदिर को कंदवा महादेव के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण 12 वीं सदी में हुआ था। इसे गढ़वाल राजाओं ने बनवाया था।
नागर स्थापत्य कला का उदाहरण है कर्दमेश्वर
कर्दमेश्वर महादेव मंदिर नागर स्थापत्य कला का उदाहरण है। यह मंदिर पंचरथ शैली में बना है। मंदिर में एक ही चबुतरा है। जिस पर गर्भगृह, प्रदक्षिणा पथ, अंतराल, महामंडप तथा अर्द्धमंडप स्थापित है।
पूर्व मुखी है यह मंदिर
कर्दमेश्वर महादेव मंदिर पूर्व मुखी है। इस मंदिर में कर्दम ऋषि ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इसलिए इस मंदिर का नाम कर्दमेश्वर पड़ा। मंदिर में एक बड़ा कुंड भी है। जिसका नाम कर्दम कुंड है। मान्यता है कि इस सरोवर का निर्माण कर्दम ऋषि के आंसूओं से हुआ था। ऐतिहासिक साक्ष्यों की बात करें तो कुंड का निर्माण बंगाल की रानी भवानी ने 18 वीं शताब्दी में कराया था।
पंचकोस यात्रा का है पहला पड़ाव
यह दिव्य स्थल कर्दम ऋषि की तपोस्थली है। बनारस की प्रसिद्ध पंचकोसी यात्रा के पथ का यह पहला पड़ाव है। मंदिर की बाहरी दिवारों पर हिंदू देवताओं की रेवती बलराम, ब्रह्मा, विष्णु, नटेश शिव, महिषासुरमर्दिनी, उमा माहेश्वर, नाग-नागी, गजांतक शिव, दशावतार पट्ट आदि कई मूर्तियां उत्कीर्ण हैं।
यहां भगवान राम को ब्रह्म हत्या से मिली थी मुक्ति
मान्यता है कि कर्दमेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से मनुष्य देव ऋण से मुक्त हो जाता है। कथाओं के अनुसार भगवान राम ने जब रावण का वध किया तो उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगा। लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो गुरु वशिष्ठ ने उन्हें माता सीता के साथ जाकर कर्दमेश्वर महादेव के दर्शन करने को कहा। भगवान यहां आए और बाबा का दर्शन किए। उसके बाद माता सीता के यहां परिक्रमा किए। तब जाकर उन्हें ब्रह्म हत्या के दोष से छुटकारा मिला।
विशेष अवसरों पर होती है आस्थावानों की जुटान
शिवरात्रि, सावन के मासशिवरात्रि, सावन के सोमवार और पंचकोसी यात्रा के समय यहां आस्थावानों की जुटान होती है।
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