श्रीराम को यहीं मिली थी ब्रह्महत्या से मुक्ति, बीएचयू से पश्चिम-दक्षिण दिशा में है कर्दम ऋषि का यह मंदिर
काशी के दक्षिणी छोर पर स्थित बीएचयू से पांच किमी पश्चिम-दक्षिण दिशा में कंदवा पोखरे के किनारे कर्दमेश्वर महादेव मंदिर है।
वाराणसी, जेएनएन। शहर के दक्षिणी छोर पर स्थित बीएचयू से पांच किमी पश्चिम-दक्षिण दिशा में कंदवा पोखरे के किनारे कर्दमेश्वर महादेव मंदिर है। इसकी स्थापना सैकड़ों साल पहले मानी जाती है। यहां पर कर्दम ऋषि ने शिवलिंग की स्थापना की थी जिससे इसका नाम कर्दमेश्वर महादेव पड़ा। मान्यता है कि रावण का वध करने के कारण प्रभु श्रीराम को लगे ब्रह्महत्या के दोष का निवारण कर्दमेश्वर महादेव के दर्शन-पूजन व परिक्रमा से हुआ था। अयोध्या लौटने के बाद वे सपरिवार यहां आए थे और ब्रह्महत्या दोष का परिहार किया।
काशी के धार्मिक परंपराओं में यात्रा तथा यात्रा के दौरान काशी खंड में स्थित देवालयों में दर्शन-पूजन का विशेष महत्व है। इसी क्रम में काशी की पंचकोसी यात्रा है। इस यात्रा में पहले विश्राम के रूप में प्रसिद्ध है कर्दमेश्वर महादेव मंदिर। इतिहासकारों के अनुसार चंदेल वंशीय राजाओं ने यहां मंदिर का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि कर्दम ऋषि के बनवाए गए कूप में जिसकी छाया दिख जाती है उसकी उम्र लंबी होती है।
गुप्त कालीन मूर्ति कला का दिखता है प्रभाव : इसे उत्तर भारतीय स्थापत्य कला की आखिरी कड़ी माना जाता है। इस पर गुप्त कालीन मूर्ति कला का प्रभाव भी दिखता है। एक बड़े चतुर्भुजा तालाब के पश्चिमी ओर स्थित यह मंदिर उड़ीसा के विकसित मंदिरों से प्रेरित है। साथ ही मूर्तिकला की संपन्नता लिए यह चंदेल इतिहास का प्रतीक है। संभवत: उत्तर भारत स्थापत्य कला के विस्तृत इतिहास की यह आखिरी कड़ी है। एक अभिलेख के अनुसार तालाब के घाटों का निर्माण रानी भवानी (1720-1810) द्वारा 1751 या 1757 में कराया गया है। वर्तमान में मंदिर के संपूर्ण देख-रेख का कार्य उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है।
मुगल आक्रमण से पहले का मंदिर : कर्दमेश्वर मंदिर के निर्माण के सही समय का निर्णय कर पाना मुश्किल है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर मुगल आक्रमण के पहले का बना हुआ है। यह गहड़वाल वंश का एकमात्र अवशेष है। वर्तमान मंदिर की दीवारों को देखकर यह प्रतीत होता है कि यह मंदिर 12वीं शताब्दी के बाद बना है। मंदिर के शेषभाग अपने स्थापत्य विशेषता में मध्यकालीन स्थापत्य को दर्शाता है। इस प्रकार यह भी हो सकता है कि संपूर्ण मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी के बाद किसी पुराने मंदिर के ध्वंसावेशेष पर बना हो। वास्तु योजना कर्दमेश्वर मंदिर पंचरथ प्रकार का मंदिर है। इस तल छंद योजना में एक चौकोर गर्भगृह अंतराल तथा एक चतुर्भुजाकार अद्र्ध मंडप है। मंदिर का निचला भाग अधिष्ठान, मध्य भित्ति क्षेत्र मांडोवर भाग है जिस पर अलंकृत तांखे बने हुए हैं।
बना है नक्काशीदार सजावटी शिखर : ऊपरी भाग में नक्काशीदार सजावटी शिखर है। मंदिर का मुख्य द्वार तीन फीट पांच इंच चौड़ा तथा छह फीट ऊंचा है। मंदिर का गर्भगृह जिसका बाहरी माप 12 गुणे 12 फीट तथा भीतरी माप आठ फीट आठ इंच चौड़ा तथा आठ फीट लंबा है। इसी गर्भगृह के मध्य ही कर्दमेश्वर शिवलिंग अवस्थित है। गर्भगृह के उत्तर-पश्चिमी कोने में छह फीट की ऊंचाई पर एक जल स्रोत है जिससे शिवलिंग पर लगातार जलधारा गिरती रहती है। वास्तुशिल्प और मूर्तिशिल्प के आधार पर यह मंदिर बहुत ही रोचक है। मंदिर के विखंडित कुर्सी या खंभों की स्थिति को देखकर यह प्रतीत होता है कि मंदिर का अद्र्ध मंडप एक बेहतर निर्माण रहा होगा। शिखर में भी आधुनिक तरह का छत तथा लकडिय़ों के आधार पर सादे पत्थरों द्वारा तैयार शिखर भी इस तथ्य को और स्पष्ट करते हैं। आधार की अपेक्षा खंभे काफी हद तक सादे हैं। पत्तियों या अद्र्ध हीरा की नक्काशी सजावट काफी खंभों पर 15वीं शताब्दी के पाए जाते हैं। कर्दमेश्वर मंदिर के अद्र्ध मंडप के दो स्तंभों पर अभिलेख है जो 14वीं-15वीं शताब्दी से है जिनसे स्पष्ट होता है कि अर्ध मंडप के निर्माण में पुरानी सामग्री को पुन: प्रयोग में लाया गया है।
खजुराहों मंदिर से मिलती हैं आकृतियां : कर्दमेश्वर मंदिर की कुछ आकृतियां जैसे दक्षिण भित्ती पर बनी उमा महेश्वर की मूर्ति खजुराहों के मंदिरों में बनी आकृतियों की तरह हैं। इसी प्रकार उत्तरी तरफ निर्मित रेवती और ब्रह्म की मूर्ति की केश सज्जा गुप्त कालीन मूर्ति कला से प्रभावित है। मंदिर पर बनी आकृतियां पुष्ट और मृदु के साथ ही चेहरे पर प्रभावकारी मुस्कान लिए हैं जबकि नाग और शेर का चित्र अपरिपक्व व भावहीन है। इसी प्रकार विस्तार के दृष्टिकोण से ही मूर्तियों में शैलीगत विभिन्नताएं हैं। उदाहरण, कुछ चित्रों में तीन पायल पहने हुए दिखाया गया है जो कि पूर्व मध्यकालीन विशेषता नहीं है। इस प्रकार की आकृतियां दुलादेव मंदिर (1150 ई0) खजुराहों व उदेश्वर मंदिर उदयपुर में देखने को मिलती हैं। इसी प्रकार सिरे पर उभरा हुआ त्रिकोणी मुक्का पट्ट तथा दो फंदों वाला कमर बंद भी सामान्य रूप से दुलादेव मंदिर में देखने को मिलता है। कुछ चित्रों में गोल पत्तीनुमा या लंबवत आंख की संरचना वाली बिंदी लगाए चित्र भी है। वामन तथा विष्णु की मूर्तियों में बने आभूषणों में घुंघरू की उपस्थिति भी बहुत बाद की मूर्ति शिल्प विशेषता है। ऐसे ही पश्चिमी भाग पर खड़ी मुद्रा में विष्णु की मूर्ति के माथे पर यू आकार का चिन्ह है जो वर्तमान समय में भी प्रचलित है। मंदिर की भित्तियों पर उनकी स्थिति तथा मूर्ति विध्वंस के विवरण यह प्रमाणित करते हैं कि कुछ मूर्तियां बेहतर स्थिति में रही होंगी।
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