Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    खतरनाक हथियार के लिए 'मलाई के साथ मूंगफली' बना तस्‍करी का कोड वर्ड, बिहार और नेपाल के रास्ते धंधा

    By Abhishek sharmaEdited By:
    Updated: Sun, 21 Feb 2021 12:57 PM (IST)

    मलाई के साथ मूंगफली भिजवा देना... कुछ इसी तरह असलहों के तस्कर मोबाइल फोन पर हथियारों का आर्डर देते हैं। जिनके आने पर शातिर बदमाशों को बेच दिया जाता है और फिर शुरू होता है अनहोनी घटनाओं का सिलसिला जिसके शिकार निर्दोष लोग होते है।

    Hero Image
    पूर्वांचल में एक चौथाई दामों में खरीदे गये असलहे दुगने दामों में बेचे जाते है।

    वाराणसी, जेएनएन। 'मलाई के साथ 'मूंगफली' भिजवा देना... कुछ इसी तरह असलहों के तस्कर मोबाइल फोन पर हथियारों का आर्डर देते हैं। जिनके आने पर शातिर बदमाशों को बेच दिया जाता है और फिर शुरू होता है अनहोनी घटनाओं का सिलसिला जिसके शिकार निर्दोष लोग होते है। खास तौर से निशाना तो व्यापारियों को बनाया जाता है। घटना के बाद पुलिस के सायरन गलियों में बजने लगते है अधिकांश मामलों में पुलिस बदमाशों को कही न कही से खोजकर गिरफ्तार कर लेती है और उनके पास से हथियार भी बरामद कर लेती है।मामला शांत हो जाने के जनता भी धीरे-धीरे घटनाओं को भूल जाती है लेकिन मौत का खेल यही नहीं खत्म होता है। बदमाश जेल से छूटने के बाद फिर नये असलहों की खोज में लग जाते है जो उन्हें सस्ते दामों में मिल जाते है। अब जरा सोचने की बात है कि असलहे तो पकड़े जाते है लेकिन उनकी आमद में कोई कमी नहीं आती तो आखिर इतनी तादात में असलहे आते कहां से है?

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    गोपनीय सूत्रों की बात यदि मानी जाय तो ये असलहे बिहार, नेपाल, आजमगढ़ व देश की सीमाओं से सटे देशों से भारत में आते है और फिर जरूरत के अनुसार प्रदेश तथा जिलों में भेजे जाते है। एक चौथाई दामों में खरीदे गये असलहे दुगने दामों में बेचे जाते है लेकिन फिर भी यह लाइसेंसी असलहों से आधे से भी कम दाम के होते है। कुछ तस्करों ने असलहों के नाम भी कोडवर्ड में रख रखे है जिससे उन्हें कही भी बात करने में कोई परेशानी न हो।

    असलहों के नामों पर यदि ध्यान दिया जाय तो एके 47 को 'बड़ी बी', पिस्टल को मलाई, रिवाल्वर को घोड़ा, कट्टाा को फुलझड़ी और गोलियों को मूंगफली के नाम से सम्बोधित किया जाता है। जरूरी नहीं है कि ये नाम टिकाऊ ही रहे समय और स्थानों के साथ ये नाम भी बदल दिये जाते है।

    वैसे तो अवैध तरीके से 303, 312, 315, .32, .38, 9एमएम, .42 बोर के अलावा 7.62 बोर के भी कट्टे बनते और बिकते है। पिस्टल में 9एमएम, .32, .42 व .30 तथा रिवाल्वर .32 व .38 के तस्करों के हाथ बदमाशों को बेचे जा रहे है। अब तो एके 47 राइफलें भी अवैध बाजार में मिलने लगी है। जिसका स्पष्ट उदाहरण यह है कि जनपद में छापेमारी के दौरान पुलिस ने एके 47 की मैगजीन व गोलियां बरामद की है तो जाहिर सी बात है कि सिर्र्फ इनसे कोई काम नहीं चलने वाला है राइफलें भी रही होगी जो पुलिस के हाथ नहीं लग पायी।

    धंधे में चलने लगी है उधारी

    जरायम की दुनिया में कोई भी काम उधार में नहीं होता है लेकिन कुछ विश्वसनीय लोगों के लिए यह नियम भी लागू हो गया है। असलहे लेने के बाद यदि पैसे कुछ कम है तो तस्कर उन्हें उधार भी दे देते है। बाद में घटनाओं को अंजाम देकर उनकी उधारी भी चुका दी जाती है। सूत्रों के मुताबिक इस उधारी के तरीके को चिल्लरबाजी कहा जाता है।

    ...तो कहां से आतेे है प्रतिबन्धित हथियार

    जौनपुर: अक्सर देखा जाता है कि आपराधिक वारदातों को अंजाम देने वाले बदमाशों के पास से प्रतिबन्धित बोर के हथियार बरामद किये जाते है। जो सिर्फ पुलिस या फिर सेना के पास ही मिलते है। अब सवाल यह है इन बदमाशों के पास ऐसे असलहे कहां से आते है। इस पर यदि गंभीरता से छानबीन किया जाय तो शायद कही न कही से प्रशासनिक खामियां जरूर नजर आयेगी। इस तरह के प्रतिबन्धित हथियारों के पकड़े जाने के बाद जवाब देने की जगह पुलिस भी बंगले झांकने लगती है। इतना जरूर है कि बाद मेें इन मामलों की गहनता से छानबीन करके असली गुनाहगारों को पकडऩे का सिलसिला जारी रहता है।