वाराणसी, जागरण संवाददाता : ज्ञानवापी परिसर में कमीशन की कार्यवाही कर रहे एडवोकेट कमिश्नर को बदलने की अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी की मांग व तहखाने की वीडियोग्राफी कराने की वादी पक्ष की अपील पर बुधवार को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रवि कुमार दिवाकर की अदालत में बहस पूरी हो गई। अदालत गुरुवार को फैसला सुनाएगी। वादी पक्ष की ओर से ज्ञानवापी मस्जिद की बैरिकेडिंग के अंदर तहखाने समेत अन्य उल्लिखित स्थलों का निरीक्षण करने का स्पष्ट आदेश देने की अपील की गई है। वहीं, प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद एडवोकेट कमिश्नर को बदलने की मांग कर रहा है। इस मामले में दोपहर दो बजे के बाद कभी भी फैसला आ सकता है। 

पांच महिलाओं की ओर से मां शृंगार गौरी के दैनिक दर्शन-पूजन व अन्य विग्रहों को संरक्षित करने को लेकर दायर वाद पर बीते आठ अप्रैल को अदालत ने अजय कुमार मिश्र को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करते हुए ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण कर दस मई तक अदालत में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। छह मई को कमीशन की कार्यवाही शुरू तो हुई लेकिन पूरी नहीं हो सकी। सात मई को अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने अदालत में प्रार्थना पत्र देकर एडवोकेट कमिश्नर बदलने की मांग कर दी। इस प्रार्थना पत्र पर तीन दिनों से अदालत में सुनवाई चल रही है। आज चौथे दिन फैसले के पूर्व लगभग दस घंटों तक अदालत में सुनवाई हो चुकी है। 

जिला प्रशासन को आदेश देने की अपील दोहराई : बुधवार को सुनवाई के दौरान वादी पक्ष के वकील सुधीर त्रिपाठी ने कहा कि कमीशन की कार्यवाही को बाधित करने की नीयत से प्रार्थना पत्र दिया गया है। कमीशन की कार्यवाही पर अंजुमन इंतजामिया मसाजिद परेशान क्यों है? सिविल जज द्वारा दिए गए कार्यवाही के आदेश के खिलाफ कमेटी ने हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। अदालत के आदेश पर छह मई को कमीशन की कार्यवाही प्रारंभ हुई और दो से ढाई घंटे चली। इसमें बैरिकेडिंग के बाहर से ही मां शृंगार गौरी की चौखट से लेकर उनके खंडित गर्भगृह की वीडियोग्राफी कराई गई। कार्यवाही के दौरान अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के वकीलों और बड़ी संख्या में जुटे नमाजियों ने एडवोकेट कमिश्नर व वादी पक्ष के वकीलों को बैरिकेडिंग के अंदर जाने से रोक दिया। उनका कहना था कि इसके लिए कोर्ट ने कोई आदेश नहीं दिया है। एडवोकेट कमिश्नर ने कोर्ट का आदेश दिखाकर अंदर जाना चाहा तो मौके पर मौजूद अधिकारियों ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी। सात मई को अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के वकीलों और बड़ी संख्या में जुटे मुस्लिम समुदाय के लोगों के विरोध के कारण एडवोकेट कमिश्नर की कार्यवाही शुरू ही नहीं हो सकी।

इस दौरान सुरक्षाकर्मी और अधिकारी मूकदर्शक बने रहे। उन्होंने अदालत से ज्ञानवापी मस्जिद, तहखाने समेत बैरिकेडिंग क्षेत्र में कमीशन की कार्यवाही सुचारू रूप से संपादित कराने के लिए जिला प्रशासन को आदेश देने की अपील दोहराई।

बहस के दौरान अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के वकीलों द्वारा दलील दी गई कि वादी पक्ष के दावे में दृश्य-अदृश्य देवता, मंदिर का अस्पष्ट स्थान व भूमिधरा में स्थित देवी-देवता के बारे में कल्पना के आधार पर कहा गया है। इस पर वादी पक्ष के अधिवक्ता सुधीर त्रिपाठी ने कहा कि यदि बैरिकेडिंग अथवा तहखाने के अंदर देवी-देवताओं के साक्ष्य, सुबूत या मंदिर होने का अवशेष नहीं मिलेगा तो एडवोकेट कमिश्नर की कार्यवाही के लिए जोर नहीं दूंगा। बैरिकेडिंग के अंदर और तहखाने की वीडियोग्राफी कराने की अपील पर आपत्ति जताते हुए अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के वकीलों अभयनाथ यादव, मुमताज अहमद, रईस अहमद, मुहम्मद तौहिद खान ने कहा कि वादी पक्ष के दावे में यह स्वीकार किया गया है कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है और दीन मुहम्मद वाले मुकदमे का वर्णन भी है। वादी पक्ष ने मस्जिद पर मुसलमानों का कब्जा स्वीकार किया है, लेकिन मस्जिद को हटाने व मुसलमानों को बेदखल करने के लिए याचना नहीं की है।

वहीं 1937 में दीन मुहम्मद की ओर से दायर मुकदमे में मस्जिद, कोर्ट यार्ड व उसके नीचे की भूमि को वक्फ संपत्ति माना गया है। स्वयं उप्र सरकार के अधिवक्ता डीजीसी (सिविल) ने अपनी दाखिल आपत्ति में मस्जिद को वक्फ का होना व वक्फ बोर्ड द्वारा संचालित होना स्वीकार किया गया है। लिहाजा मस्जिद के अंदर अथवा उसके नीचे कमीशन की कार्यवाही कराने का कोई औचित्य नहीं है। वादी पक्ष के दावे में आराजी नंबर 9130 व पांच कोस भूमि का डी जूरे (वास्तविक नहीं) स्वामी होना मूर्ति को कहा गया है। लिहाजा मूर्ति उसके वास्तविक स्वामी नहीं है। विवादित संपत्ति को जिस रूप में वाद पत्र में वर्णित किया गया है और उसका आराजी नंबर 9130 बताया गया है। उसका संपूर्ण विवरण, स्थिति व चौहद्दी न दिए जाने के कारा वाद पोषणीय नहीं होता है। वादी पक्ष ने केवल इस बात का संदेह किया है कि मस्जिद के अंदर कुछ दृश्य व अदृश्य देवी-देवताओं के चिन्ह मौजूद है, लेकिन कल्पना व संभावना के आधार पर कमीशन जारी नहीं किया जा सकता। कमीशन उसी स्थिति में जारी किया जा सकता है जब न्यायालय को आवश्यक लगे कि विवादित मसले को स्पष्ट करने के कमीशन जारी किया जाना आवश्यक हो।

वादी द्वारा ऐसा कोई भी ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है और न ही वाद पत्र के समर्थन में कोई साक्ष्य दिया गया है। इससे विवादित मामले के विशदीकरण के लिए कमीशन मस्जिद के अंदर कराया जाए। शासकीय अधिवक्ता द्वारा दाखिल प्रार्थना पत्र में शृंगार गौरी के बाहर स्थित होना बताया गया है और मस्जिद परिसर में कमीशन द्वारा भ्रमण अथवा रिपोर्ट प्रस्तुत करने का कोई औचित्य नहीं है। अदालत के आदेश में मस्जिद या बैरिकेडिंग के अंदर कमीशन की कार्यवाही करने का उल्लेख नहीं है।

ज्ञानवापी मस्जिद में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद द्वारा सुरक्षा के लिए ताला बंद रहता है और वादीपक्ष के मूल प्रार्थना पत्र में ताला तोड़ कर वीडियोग्राफी कराए जाने का कोई जिक्र नहीं है। लिहाजा मस्जिद के अंदर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से अथवा ताला खोलकर या तोड़कर कमीशन कराए जाने का विधिक अधिकार नहीं है। सुनवाई के दौरान प्रशासन की ओर से मौजूद जिला शासकीय अधिवक्ता महेंद्र प्रसाद पांडेय व काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास की ओर से रवि कुमार पांडेय ने कमीशन की कार्यवाही पूरी कराने के लिए आदेश जारी करने की अपील की।

Edited By: Abhishek Sharma