किसान और विज्ञान का मेल बना पहले व्यावसायिक ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट का आधार, आइआइटी बीएचयू के विज्ञानी की तकनीक
Green Hydrogen Plant ग्रीन हाइड्रोजन 99.9 फीसद शुद्ध होगी। इसे परिष्कृत कर कंपनी किसानों से खरीद लेगी। साथ ही इससे मीथेन हाइड्रोजन कार्बनडाइ आक्साइड व चारकोल अलग हो जाएगा। ईजाद की गई तकनीक से देश का पहला व्यावसायिक ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट मध्य प्रदेश के खंडवा में लगने जा रहा है।

वाराणसी, शैलेश अस्थाना। आइआइटी बीएचयू के विज्ञानी सिरैमिक इंजीनियरिंग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. प्रीतम सिंह इतिहास रचने जा रहे हैं। उनकी ईजाद की गई तकनीक से देश का पहला व्यावसायिक ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट मध्य प्रदेश के खंडवा में लगने जा रहा है। मध्य प्रदेश सरकार की सहायता से खंडवा के 24 किसानों का गठित एफपीओ (फार्मर्स प्रोडक्शन आर्गेनाइजेशन) इसके लिए आगे आया है। इन किसानों की तीन एकड़ जमीन में 24 करोड़ की लागत से 24 रिएक्टर वाला प्लांट केवल कृषि अपशिष्टों से प्रतिदिन एक टन क्रूड ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करेगा। इनके द्वारा उत्पादित ग्रीन हाइड्रोजन गैस की खरीद वाटोमो एनर्जी नामक स्वदेशी कंपनी 40 रुपये प्रति किग्रा के भाव से करेगी। इसके लिए किसानों और कंपनी के बीच करार हुआ है। एफपीओ का प्रत्येक भागीदार किसान अपनी लगभग चार बिस्वा जमीन प्लांट के लिए देकर अतिरिक्त आय प्राप्त करेगा।
डा. प्रीतम सिंह बताते हैं कि उनकी निजी कंपनी वीजल ग्रीन एनर्जी की टाड (टैन टेक्नालाजी थर्मली एक्सलेटेड एनरोबिक डाइजेशन) तकनीक से स्थापित होने वाले 24 रिएक्टर के इस प्लांट पर 100 लोगों को रोजगार मिलेगा। इनके वेतन आदि का खर्च वाटोमो एनर्जी कंपनी वहन करेगी। प्रधानमंत्री के ग्रीन एनर्जी के उत्पादन के आह्वान पर मध्य प्रदेश सरकार 40 एकड़ में एग्रो हब बना रही है, जिसमें चार एकड़ भूमि वाटोमो एनर्जी को आवंटित हुई है। इस चार एकड़ भूमि में 24 किसानों की जमीन है। तीन एकड़ में प्लांट होगा, जबकि एक एकड़ में अन्य सुविधाएं विकसित की जाएंगी। वह बताते हैं कि यदि केवल रिएक्टर के लिए चार एकड़ भूमि उपलब्ध होती तो एक दिन में एक टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन होता।
99.9 फीसद शुद्ध ग्रीन हाइड्रोजन का होगा उत्पादन
डा. सिंह बताते हैं कि उनकी तकनीक से उत्पादित ग्रीन हाइड्रोजन 99.9 फीसद शुद्ध होगी। इसे परिष्कृत कर कंपनी किसानों से खरीद लेगी। साथ ही इससे मीथेन, हाइड्रोजन, कार्बनडाइ आक्साइड व चारकोल अलग हो जाएगा। इस क्रूड ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग जेट विमान, राकेट, वायुयान आदि के ईंधन के रूप में किया जा सकता है। साथ ही इसके बाइप्रोडक्ट के रूप में सीएनजी व 100 फीसद
शुद्ध चारकोल का उत्पादन होगा।
मीरजापुर में है दुनिया का पहला डिमांस्ट्रेशन प्लांट
डा. सिंह ने अपने पैतृक गांव मीरजापुर जनपद के चुनार इलाके के रामपुर सक्तेशगढ़ में दुनिया का पहला डिमांस्ट्रेशन प्लांट 2020 में स्थापित किया था। यह उनकी कंपनी वीजल ग्रीन का पायलट प्रोजेक्ट है। अब देश के अन्य हिस्सों में भी हाइड्रोजन ऊर्जा के उत्पादन की योजना को यह प्लांट दिशा देने का काम कर रहा है। इस डिमांस्ट्रेशन प्लांट की क्षमता प्रतिदिन 50 किग्रा हाइड्रोजन उत्पादन की है, लेकिन उनके पास अभी हाइड्रोजन कंप्रेशर नहीं है। यहां 36 घंटे में टाड तकनीक से हाइड्रोजन तैयार किया जा रहा है। इस प्रविधि के अंत में बचता है शून्य कार्बन उत्पादन वाला सबसे शुद्ध कोयला और सिलिकान। इस सिलिकान का उपयोग सौर ऊर्जा की प्लेटों के निर्माण में किया जाएगा। फिर तो देश ऊर्जा क्षेत्र में भी महाशक्ति बन सकता है।
लाखों वर्षों के प्राकृतिक उपक्रम को 36 घंटे में समेटा
देश की ऊर्जा क्षेत्र की नामी-गिरामी प्राइवेट व सरकारी कंपनियां आकर संयंत्र की इस अत्यंत सस्ती कार्य प्रणाली को समझ रही हैं। यहां लकडिय़ों से हाइड्रोजन गैस सीधे अवशोषित कर उसे कोयले में बदल दिया जाता है यानी लाखों वर्षों के प्राकृतिक उपक्रम को मात्र 36 घंटे में समेट दिया जाता है। इस तकनीक से डा. सिंह बताते हैं कि ग्रीन ऊर्जा उत्पादन से देश में पेट्रोलियम निर्भरता घटेगी। बीजल ग्रीन, बायोमास आधारित हाइड्रोजन-कम-बायोचर प्लांट लगाने के लिए महाराष्ट्र की स्वराज ग्रीन पावर एंड फ्यूल लिमिटेड के साथ भी सतारा में संयंत्र लगाने के लिए बातचीत चल रही है। यह योजना परवान चढ़ी तो एशिया में सबसे बड़ी ग्रीन पावर एंड फ्यूल उत्पादक संयंत्र बनेगा।
साढ़े सात टन क्रूड ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन रोज
डा. सिंह बताते हैं कि 15 टन कृषि अपशिष्ट (बायोमास- पराली, भूसा, सब्जियों के छिलके, पेड़-पौधों की पत्तियां, लकड़ी, पाम वेस्ट, फूल आदि) से साढ़े सात टन क्रूड हाइड्रोजन गैस तैयार की जा सकती है। साथ ही एक किग्रा बायोमास से दो यूनिट व 1000 किग्रा से दो मेगावाट बिजली उत्पन्न की जा सकती है।
पराली व प्रदूषण की समस्या का भी समाधान
डा. प्रीतम की इस तकनीक से ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन जहां देश में बड़े ईंधन संकट का खात्मा करने में सहयेागी होगा, वहीं इससे पराली व प्रदूषण की समस्या खत्म हो जाएगी। किसान खेत में अनाज उत्पादन के बाद पराली जलाएंगे नहीं, बल्कि उसे एफपीओ को बेच देंगे। इस तरह कृषि अपशिष्टों का बाजार खुल जाएगा और किसानों की आय बढ़ जाएगी।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।