Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    कंडाकोट पहाड़ी पर गूंजते हैं कण्व ऋषि के मंत्र, यहां पग पग पर बिखरा है वैदिक काल का इतिहास

    By Abhishek SharmaEdited By:
    Updated: Fri, 31 Jan 2020 10:37 PM (IST)

    अनगिनत ऐसी कथाएं हैं जो कण्व ऋषि व सोनभद्र को एकसाथ जोड़ती हैं यहां की कंडाकोट पहाड़ी पर कण्व ऋषि से जुड़ा इतिहास बिखरा पड़ा है।

    कंडाकोट पहाड़ी पर गूंजते हैं कण्व ऋषि के मंत्र, यहां पग पग पर बिखरा है वैदिक काल का इतिहास

    सोनभद्र [अरुण मिश्र]। कण्व ऋषि सप्तऋषि परंपरा के थे। इसमें शामिल थे वशिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक। आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है इन्हीं के नाम पर उन्हें सप्तषि मंडल कहा जाता है। एक मान्यता यह है कि अगस्त्य, कश्यप, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, अष्टावक्र, ऐतरेय, कपिल, जैमिनी, गौतम ऋषि को भी उक्त सात ऋषियों के कुल का होने के कारण वही दर्जा प्राप्त है। कहते हैं तपस्वी अपनी साधना से बंजर भूमि को उर्वर बना देते हैं। कुछ ऐसा ही सोनभद्र की धरती के साथ हुआ। आज से लगभग पांच हजार पहले जब वेदों की रचना हो रही थी तब कण्व ऋषि ने ऋग्वेद के कुछ मंत्रों की रचना की थी। इसके साथ अनगिनत ऐसी कथाएं हैं जो कण्व ऋषि व सोनभद्र को एकसाथ जोड़ती हैं। यहां की कंडाकोट पहाड़ी पर कण्व ऋषि से जुड़ा इतिहास बिखरा पड़ा है।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    भरत की गूंजी थीं किलकारियां 

    कंडाकोट यानी कण्व ऋषि की तपोस्थली कैमूर पर्वत शृंखला के शीर्ष पर स्थित है। यह जिला मुख्यालय से मात्र आठ किमी की दूरी पर है। यही वह जगह है जहां पर राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का लालन-पालन हुआ था। इस महात्म्य को देखते हुए वर्ष 2019 में वसंत पंचमी के दिन कण्व ऋषि की आदमकद मूर्ति की स्थापना हुई। कर्नाटक के एक अनुयायी ने कंडाकोट संरक्षण समिति के साथ मिलकर प्राण प्रतिष्ठा कराई। यह पहाड़ी बहुआर गांव के अंतर्गत आती है। इसी पहाड़ी पर अद्र्धनारीश्वर महादेव का मंदिर है। इसके सामने ही चबूतरे पर कण्व ऋषि की प्रतिमा स्थापित की गई है।

    भित्ति चित्रों में समाया है अतीत

    यहां कंडाकोट पहाड़ी में दो ऐसी गुफाएं हैं जहां हजारों साल पुराने भित्ति चित्र बने हैं। सबसे पुरानी चित्रकला में बने विभिन्न तरह के चित्र यहां पहुंचने वाले लोगों के लिए आकर्षण होते हैं। ये भित्ति चित्र उस दौर के सामाजिक, आर्थिक स्थिति को बताते हैं। हजारों साल की सभ्यता और संस्कृति को जानने का इससे अच्छा माध्यम नहीं है। हालांकि देखरेख के अभाव में दुर्लभ धरोहरें अस्तित्व खोती जा रही हैं।

    सोमयज्ञ की हुई थी शुरुआत

    माना जाता है सबसे महत्वपूर्ण सोमयज्ञ को कण्व ने व्यवस्थित किया। 103 सूक्त वाले ऋग्वेद के आठवें मंडल के अधिकांश मंत्र महर्षि कण्व, उनके वंशजों तथा गोत्रजों द्वारा दृष्ट हैं। कुछ सूक्तों के रचयिता अन्य ऋषि हैं, लेकिन प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति के अनुसार महर्षि कण्व अष्टम मण्डल के दृष्टा ऋषि कहे गए हैं। इनमें लौकिक ज्ञान-विज्ञान तथा अनिष्ट-निवारण सम्बन्धी उपयोगी मंत्र हैं।

    कण्व नाम से हुए कई व्यक्ति 

    प्राचीन भारत में कण्व नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध महर्षि कण्व थे जिन्होंने मेनका के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र की कन्या शकुंतला का पालन पोषण किया था। कहते हैं कि शकुंतला के पुत्र भरत का जातकर्म यही संपादित किए थे। दूसरे कण्व कंडु के पिता थे जो अयोध्या के पास स्थित अपने आश्रम में रहते थे। रामायण के अनुसार वे राम के लंका विजय करके अयोध्या लौटने पर वहां आए थे वर उन्हें आशीर्वाद दिया था। तीसरे कण्व पुरुवंशी राज प्रतिरथ के पुत्र थे जिनसे काण्वायन गोत्रीय ब्रह्मणों की उत्पत्ति बताई जाती है। इनके पुत्र मेधातिथि हुए व कन्या इंलिनी। चौथे कण्व ऐतिहासिक काल में मगध के शुंगवंशीय राज देवमूर्ति के मंत्री थे जिनके पुत्र वसुदेव हुए। पांचवें कण्व पुरुवंशीय राजा अजामिल के पुत्र थे। छठे महर्षि कश्यप व सातवें महर्षि घारे के पुत्र थे, जिन्होंने ऋग्वेद के अनेक मंत्रों की रचना की है। 

    औषधियों से भरपूर है कंडाकोट 

    कंडाकोट की पहाड़ी ऐतिहासिक ही नहीं औषधीय गुणों से भी परिपूर्ण है। कई बीमारियों को ठीक करने की विशेषता वाले पारिजात के हजारों पौधे हैं। मुरेरा, वन तुलसी व पथरचट्टी समेत तमाम ऐसे पौधे हैं जिसकी जानकारी होने के बावजूद ये लुप्त हो गए। कंडाकोट विकास एवं संरक्षण समिति इस स्थल के संरक्षण को लेकर सदैव प्रयासरत है, मगर जरूरत प्रशासन व पर्यटन विभाग के सहयोग की है। 

    वसंत पंचमी पर लगाता है मेला

    कंडाकोट पहाड़ी पर वसंत पंचमी पर लगने वाला मेला सिर्फ मनोरंजन नहीं है, अपने में सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक विकास के बिंदु समेटे रहता है। यहां पहाड़ी के शीर्ष पर पहुंचते ही एक अलग दुनिया दिखती है। शांत वातावरण चित्त को एकाग्र कर देता है। सैकड़ों सीढिय़ां चढऩे के बाद विशाल खाली मैदान में कहीं-कहीं पेड़ व झुरमुट दिखाई देते हैं तो आगे चलने पर दिव्य मंदिर, विश्राम गृह, जलकुंड आदि। बड़े और चिकने पत्थर अपने प्राचीन होने की गवाही देते हैं।