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    लोकनायक जयप्रकाश नारायण के कारण ब‍लिया के सिताबदियारा को अपना तीर्थ मान लिए चंद्रशेखर

    By Saurabh ChakravartyEdited By:
    Updated: Thu, 07 Oct 2021 05:14 PM (IST)

    देश में आजादी की लड़ाई से लेकर वर्ष 1977 तक तमाम आंदोलनों में जेपी का अहम रोल रहा है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भारतीय जनमानस पर अपना अमिट छाप छोड़ी है। जेपी के समाजवाद का नारा आज भी गूंज रहा है।

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    देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए जेपी को तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा

    बलिया, लवकुश सिंह। संपूर्ण क्रांति के प्रणेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण की आठ अक्टूबर को पुण्यतिथि है। इस दिन जेपी के गांव सिताबदियारा में कोई बड़ा कार्यक्रम तो नहीं होता, लेकिन गांव के लोग उन्हें अपने अंदाज में नमन जरूर करते हैं। पुरानी यादों को ताजा करते हैं। यहां के लोगों को याद है आठ अक्टूबर 1979 का वह दिन, जब जेपी के निधन की सूचना उनके गांव पहुंची थी। तब सिताबदियारा का कोना-कोना रो पड़ा था। सभी लोग जेपी के निवास की ओर दौड़ पड़े थे। कई लोग उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए उसी समय पटना के लिए निकल गए थे।

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    जेपी को जानने और समझने वाले इस क्षेत्र के जैनेंद्र कुमार सिंह, शिवदयाल यादव, चंद्रदेव यादव आदि ने बताया कि जेपी के कारण ही यह गांव पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दिलों में बसा। चंद्रशेखर बहुत पहले जेपी से जुड़ चुके थे। जब आखिरी बार जेपी सात सितंबर 1978 को अपने गांव सिताबदियारा के जयप्रकाश नगर आए तो वह यहां तीन दिन रहे थे। यहां से जाने के पहले वह चंद्रशेखर को अपनी हेलीकाप्टर में बैठाकर पूरे सिताबदियारा का एक चक्कर लगाए। फिर नीचे उतरने के बाद चंद्रशेखर से बस इतना बाेले..मेरे गांव के लोग भोले हैं, इनका ख्याल रखिएगा। तभी से चंद्रशेखर इस गांव को अपना तीर्थ मान लिए।

    चंद्रशेखर के प्रयासाें से ही आज जयप्रकाशनगर में जेपी के नाम पर बहुत कुछ बन चुका है। विशाल जेपी संग्रहालय, पुस्तकालय, जेपी नारायण ग्रामीण प्रौद्योगिकी केंद्र, प्रभावती देवी राजकीय इंटर कालेज, जेपी इंटर कालेज आदि सब चंद्रशेखर के प्रयासों से ही संभव हो सका है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जब तक जीवित थे, जेपी की जयंती 11 अक्टूबर को पूरी दिल्ली सिताबदियारा में होती थी। राष्ट्रीय स्तर के विमर्श हुआ करते थे। विमर्श से निकली बातें पूरे देश के लिए संदेश होती थी। चंद्रशेखर के इस लोक से विदा होने के बाद अब उस तरह का जमावड़ा भी नहीं हो पाता। उनकी पुण्यतिथि पर स्कूली बच्चे और गांव के लोग ही प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हैं।

    जेपी के विचारों के विपरीत राहों पर देश

    जेपी ट्रस्ट के व्यवस्थापक अशोक कुमार सिंह बचपन से जेपी के करीब रहे। आज के हालात पर बात करने पर उन्होंने कहा कि जेपी की पुण्यतिथि पर देश के नेता उन्हें याद तो करते हैं, लेकिन उनकी विचारों वाला देश नहीं बना सके। जेपी होते तो देखते कि आज कितने दलों के संगठनों में तानाशही कायम हो चुकी है। कभी जेपी के सांथ रहने वाले कदावर नेता भी आज जेपी के विचारों विपरीत चलते दिख रहे हैं। 1974-75 में जेपी आंदोलन के चार प्रमुख मुद्दे थे-महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और गलत शिक्षा नीति। आज कौन सी सरकार इन समस्याओं को सुलझाने के प्रति गंभीर है, जबकि सभी मुद्दे आम जनता से जुड़े हुए हैं।