वाराणसी, जेएनएन। 'किस्सा तोता मैना' व भरथरी (भृतहरि) जैसी रचनाओं की लीक से अलग एक बड़ी लकीर खींचते हुए कल्पना के धनी उस चितेरे ने जब हिंदी साहित्य का पहला परिचय 'फंतासी' और थ्रिलर जैसी विधाओं से कराया तो उपन्यास लेखन के क्षेत्र में जैसे तहलका मच गया। वह दौर था सन् 1888 का। नेपाली खपड़ा के हरिप्रकाश यंत्रालय से प्रकाशक बाबू अमीर सिंह वर्मा के जोड़ जतन के फलस्वरूप बाजार में उतरी अनूठी रचना चंद्रकांता ने वह धूम मचाई कि पूरा बनारस शहर ही पढ़वइया बन गया। पुस्तक के लेखक बाबू देवकीनंदन खत्री रातों रात लाखों दिलों के महबूब बन गए। उनकी कलमकारी के जहूरे का लहराता परचम तन गया। 'चंद्रकांता' से परिचय की ऐसी दीवानगी कि हजारों-लाखों को हिंदी सीखनी और पढऩी पड़ी। साहित्य के मनसबदारों को लेखन की नई परिभाषा गढऩी पड़ी।

फिलदौर में बाबू देवकीनंदन खत्री के करीबी रिश्तेदार राजेश खत्री अपने पुरखों की कही-सुनी के लस्तगे से बताते हैं कि हिंदी साहित्य के क्षेत्र में यह सही तौर पर एक इंकलाब था। नई बयार थी। बिल्कुल अनोखा ख्वाब था। चंद्रकांता और उसके बाद चंद्रकांता संतति के ग्यारह भाग हरि प्रकाश यंत्रालय में ही छपे। आगे चलकर लाहोरी टोला का मकान छोड़ रामकटोरा इलाके में आ बसे देवकीनंदन जी ने यहीं पर लहरी प्रेस लगाया (सितंबर 1898) और पुस्तक के अन्य संस्करणों समेत खत्री जी की अन्य रचनाओं भूतनाथ, रोहतास मठ, हीरों की घाटी आदि का प्रकाशन यहीं से होता रहा। हालांकि भूतनाथ व रोहतास मठ की सिरीज बाबू साहब की मृत्यु के बाद उनके यशस्वी पुत्र बाबू दुर्गा प्रसाद खत्री ने आगे बढ़ाई।

मूल जन्म स्थान (मुजफ्फरपुर) छोड़कर काशी आ बसे रईस लाला ईश्वरदास जी के पुत्र देवकीनंदन पहले गया (बिहार) के टिकारी राज के प्रबंधक रहे। बाद में काशी आए और तत्कालीन काशिराज राजा ईश्वरी नारायण सिंह के कृपापात्र बनकर जंगलों का ठेका लेने लगे। चकिया और नौगढ़ के जंगलों में घूमते और लाह, लकड़ी, शहद, गोंद वगैरह की तिजारत से उन्होंने रकम तो बनाई ही जंगलों-पहाड़ों की खूब सैर भी की। यहीं के अनुभव और कल्पनाओं का खजाना आगे चलकर उनके उपन्यासों का आधार बना। बीहड़ वन, पहाड़ी खोहें, प्राचीन इमारतों के अवशेषों में उन्होंने रोमांच के तत्व ढूंढ़े और एक प्रेम कथा में गूंथ कर इन बेजान ठौरों को अपनी रचनाओं का जीवंत पात्र बना दिया। राजेश बताते हैं कि अपने निजी खर्च के जरिये उन्होंने सुदर्शन नाम से एक मासिक पत्र भी निकाला, जो बाद में बंद हो गया। 

हिंदी साहित्य को बोझिलता से परे एक उन्मुक्त उड़ान देने वाले असीम कल्पना के धनी इस कलमकार का एक अगस्त 1913 को निधन हो गया। पुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री (नरेंद्र मोहिनी, भूतनाथ, रोहतास मठ, काजर की कोठरी, गुप्त गोदना) ने दूसरी पीढ़ी तक लेखन की इस रोचक विधा व पिता द्वारा स्थापित लहरी प्रेस (राम कटोरा) की विरासत को संभाले रखा। उनके बाद शनै: शनै: यह थाती छीजती चली गई और साहित्य लेखन की यह अनूठी विधा इतिहास के पन्नों में दफन होकर रह गई।

कहानी बनकर रह गई हर निशानी : इसे विडंबना ही कहेंगे कि 21वीं सदी में भी टीवी धारावाहिक के रूप में अपार लोकप्रियता बटोरने वाली चंद्रकांता के कुशल रचनाकार बाबू देवकीनंदन की जमीनी निशानियां भी बस कहानी बनकर रह गईं। लाहौरी टोला ही नहीं रहा तो टोले वाले मकान की बात क्या करना। एक मात्र वारिस विवेक खत्री आम जिंदगी के झंझावातों से जूझते हुए मुंबई की ओर निकल गए। राम कटोरा वाले मकान की भी वक्ती शक्ल बदल चुकी है। लहरी प्रेस का बोर्ड भी सत्तर के दशक के बाद समय की आंधी में उधिया गया। शहर में कोई प्रतिमा वगैरह न होने से खत्री जी का नाम भी नई पीढ़ी के लिए अजनबी और अबूझा रह गया। 

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Posted By: Abhishek Sharma

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