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    कुषाण व शैव धर्म को जोड़ता है बभनियांव का शिलालेख, विशेषज्ञ अवशेषों के अध्ययन में जुटे

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    Updated: Mon, 15 Jun 2020 10:21 AM (IST)

    वाराणसी के बभनियांव गांव में कुषाणकालीन शैव शिलालेख खंडित प्रस्तर स्तंभ पर उत्कीर्ण मिला था। कुषाणों के शैवधर्म से संबंधित अपनी तरह का पहला लेख है।

    कुषाण व शैव धर्म को जोड़ता है बभनियांव का शिलालेख, विशेषज्ञ अवशेषों के अध्ययन में जुटे

    वाराणसी, जेएनएन। पंचकोसी मार्ग स्थित बभनियांव गाव में कुषाणकालीन शैव शिलालेख एक खंडित प्रस्तर स्तंभ पर उत्कीर्ण मिला था। यह लेख कुषाणों के शैवधर्म से संबंधित अपनी तरह का पहला लेख है, जो वर्ष 2017 में सर्वेक्षण के दौरान मिला था। अब तक भारतवर्ष के विभिन्न भागों से कुषाणों के जैन व बौद्ध धर्म से संबंधित लेख ही मिले हैं। मगर यह लेख ऐतिहासिक दृष्टि से यह साबित करता है कि कुषाण शासक जो बौद्ध और जैन धर्म से अत्यंत प्रभावित थे, उन्होंने शैवधर्म को भी अंगीकार किया था। भिक्षुबल ने जब पहली बार कनिष्क के तीसरे राज्यावर्ष में सारनाथ में बोधिसत्व प्रतिमा औश्र छत्र-यष्टि का दान किया, उसी के चार वर्ष बाद सातवें राज्यावर्ष में पहली बार शैव धर्म के केंद्र बभनियांव में एक शिला-यष्टि का भी निर्माण कराया था।

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    लिपि कुषाणकालीन ब्राह्मी और भाषा प्राकृत मिश्रित संस्कृत

    प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग-बीएचयू की प्रो. सुमन जैन के मुताबिक इसकी लिपि कुषाणकालीन ब्राह्मी और भाषा प्राकृत मिश्रित संस्कृत है। लेख की प्रकृति राजकीय है और स्वरूप धाíमक। लेख का उद्देश्य एक शिला-यष्टि का दान है। इसमें कुल दो पंक्तिया हैं, जिसमें भिक्षुबल द्वारा धाíमक पुण्यवृद्धि के लिए (भगवान शिव के सम्मान में) एक शिला-यष्टि के निर्माण का उल्लेख है। जो इस प्रकार है- 'संवत् 7, हेमंत मास 5 (?4) के 30वें दिन भिखुबल (भिक्षुबल) ने एक शिला-यष्टि का निर्माण कराया। (सभी प्राणियों के) धार्मिक पुण्यवृद्धि के लिए।' लेख की तिथि संवत् सात दी गई है और पहली पंक्ति खंडित होने के कारण कठिनाई से पढ़ने पर हेमंत मास 5 (?4) और दिन तीस जान पड़ता है। कुषाण शक संवत् का प्रयोग करते थे, अत: कुषाण ब्राह्मी लिपि में लेख का उत्कीर्णन होने से इसकी तिथि संवत् सात शक संवत् अठहत्तर (78) का जान पड़ता है। इस आधार पर लेख की तिथि 78+7= 85 ईस्वी निर्धारित होती है।

    तीन अन्य अभिलेखों में भिक्षुबल का उल्लेख

    प्रथम शताब्दी ईस्वी में वाराणसी कुषाण शासक कनिष्क के अधिकार क्षेत्र में था, जिसकी पुष्टि सारनाथ बौद्ध-प्रतिमा लेख वर्ष तीन (3+78= 81 ईस्वी) से होती है। अत: निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि लेख की तिथि संव सात कुषाण राजा कनिष्क का राज्यावर्ष सात (7) है और शक संव प्रथम शताब्दी ईस्वी का है। इस प्रकार ये दोनों लेख कनिष्क शासन के तीसरे और सातवें राज्यावर्ष अर्थात 81 व 85 ईसवी के हैं, जो बौद्ध और शैव धर्म के केंद्र स्थल वाराणसी में क्रमश: सारनाथ और बभनियांव ग्राम में दान देते समय लिखवाए गए थे। इसमें दानकर्ता का नाम बिना किसी परिचय के भिखुबल (भिक्षुबल) मिलता है, जिसने वाराणसी में आकर शैवधर्म को दान किया। कुषाण काल के ऐसे तीन और अभिलेख (कनिष्क का सारनाथ लेख वर्ष-3, कनिष्क का सहेट-महेट या प्राचीन श्रावस्ती लेख व हुविष्क का मथुरा लेख वर्ष-33) मिले हैं, जिसमें भिखुबल का नाम परिचय के साथ आया है। इन तीनों लेखों का विश्लेषण करने पर यह संभावना प्रबल हो जाती है कि इसमें वíणत भिक्षुबल और बभनियांव में मिले शिलालेख का भिक्षुबल दोनों एक ही हैं।