-गुदा संबंधी रोगों के इलाज हेतु डेनमार्क की मशीनें, आधुनिक सुविधा

-उपचार खर्च बेहद कम, कुलपति डा. लालजी सिंह ने किया उद्घाटन

वाराणसी : आयुर्वेद में बवासीर और भगंदर रोग के निवारण के लिए क्षार सूत्र की बात कही गई है। क्षार सूत्र के जरिए इन रोगों का इलाज सिर्फ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ही होता है। अब यहां देश का पहला क्षार सूत्र केंद्र भी बन गया है। सर सुंदरलाल अस्पताल परिसर में बने इस केंद्र का उद्घाटन मंगलवार को कुलपति डा. लालजी सिंह ने किया।

अत्याधुनिक सुविधा : इस केंद्र में क्षार सूत्र की अत्याधुनिक मशीनें लगाई गई हैं। गुदा रोगों के निदान के लिए एनोरेक्टल अल्ट्रासोनोग्राफी, 16 चैनल मैनोमेट्री, वीडियो कोलोनोस्कोप जैसी मशीनें डेनमार्क से मंगाई गई हैं। इन मशीनों के लगने से बीएचयू आयुर्वेद संकाय भारत का पहला अत्याधुनिक क्षार सूत्र केंद्र बन गया है। केंद्र का भवन दो मंजिला बनाया गया है। इसमें स्वागत कक्ष, प्रतीक्षालय, अत्याधुनिक निदान कक्ष, लघु शल्य कक्ष आदि हैं। ज्ञात हो कि इस विधि का पहला प्रयोग सन 1964 में बीएचयू आयुर्वेद संकाय के प्रो. पीजे देशपाण्डे और पीएस शंकरन ने ही किया था जो विश्व में क्षार सूत्र विधि के प्रयोग के संस्थापक भी माने जाते हैं। इस केंद्र को बनाने में दक्षेस देशों ने भी सहयोग दिया।

उद्घाटन अवसर पर चिकित्सा विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. आरजी सिंह, आधुनिक मेडिसीन संकाय की डीन प्रो. माण्डवी सिंह, आयुर्वेद संकाय के डीन प्रो. सीबी झा, प्रो. मनोरंजन साहू, डा. आनंद चौधरी, छात्र अधिष्ठाता डा. विनय कुमार सिंह आदि मौजूद थे।

बेहद कम खर्च : बीएचयू में क्षार सूत्र केंद्र बनने के बाद यहां मरीजों को काफी सहूलियत हो जाएगी। यदि कोई मरीज कहीं अन्यत्र गुदा रोग का इलाज करा रहा है तो वह अपने को बीएचयू रेफर कराकर क्षार सूत्र केंद्र का लाभ उठा सकता है। नए मरीजों को कोई खास उपक्रम नहीं करना है। वे बीस रुपए का साधारण पर्चा कटवाकर क्षार सूत्र केंद्र में अपने को दिखला सकते हैं। यदि आपरेशन की स्थिति नहीं है तब चार पांच सौ रुपये में इसका उपचार हो जाता है। ज्ञात हो कि आयुर्वेद की यह पद्धति, अन्य पद्धतियों के मुकाबले सस्ती भी है।

इनसेट

आखिर है क्या यह क्षार सूत्र

क्षार सूत्र विशेषज्ञ प्रो. मनोरंजन साहू बताते हैं कि गुदा रोग से जुड़े भगन्दर, बवासीर आदि के आयुर्वेदिक निदान की पद्वति का नाम है क्षार सूत्र। आयुर्वेदिक औषधियों से बना यह एक प्रकार का धागा है जो भगंदर एवं नाड़ी-ब्रण की चिकित्सा में प्रयुक्त होता है। चिकित्सा की इस विधि की पुनस्र्थापना बीएचयू स्थित आयुर्वेद संकाय, आइएमएस के शल्य तंत्र विभाग द्वारा की गई है और इसकी प्रमाणिकता केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान परिषद एवं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा की जा चुकी है।

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