विशेष: नाम रोशन करने वाले मजरूह घर में ही बेगाने
अपनी रचनाओं से देश समाज व साहित्य को दी नई दिशा दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजे गए मजरूह की 22वीं पुण्यतिथि आज

सुलतानपुर: अपनी रचनाओं, गीतों व गजलों से लोगों के दिलों पर राज करने वाले मजरूह सुलतानपुरी अपने घर (जिले) में बेगाने हो गए। देश, समाज व साहित्य को नई दिशा देने और करीब पांच दशक तक फिल्मी दुनिया में परचम लहराने वाले मजरूह सुलतानपुरी के नाम से बना इकलौता पार्क दुर्दशाग्रस्त है। यहां तक कि उनकी पुण्यतिथि पर जिले में कोई कार्यक्रम तक नहीं हो रहे हैं।
एक अक्टूबर 1919 को कुड़वार ब्लाक के गजेहड़ी गांव में पैदा हुए मजरूह का असली नाम असरार उल हसन खान था। मदरसा में उन्होंने अरबी और फारसी की शिक्षा ली। इसके बाद लखनऊ से हिकमत (यूनानी मेडिसिन) की पढ़ाई की। कुछ समय तक उन्होंने शहर के पल्टन बाजार में मरीजों को दवाइयां भी दीं। उनकी कलम दिलों के दर्द की दवा देने को बेताब थी।
1945 में जिगर मुरादाबादी के साथ वे मुशायरे में शामिल होने मुंबई चले गए, जहां फिल्म जगत की तमाम हस्तियां पहुंची थीं। मंच पर पहुंचे और ऐसी शायरी पढ़ी कि हर कोई उनका दीवाना हो गया। मुशायरे के बाद राशि कारदार ने अपनी फिल्म शाहजहां के लिए गीत लिखने की पेशकश की तो जिगर ने मजरूह से लिखवाने की बात कह दी।
फिल्म शाहजहां 1946 में रिलीज हुई। इसमें मजरूह का पहला गाना जब दिल ही टूट गया..हम जी के क्या करेंगे.. शामिल हुआ। इसके बाद वह मुंबई के ही होकर रह गए। दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजे गए गीतकार की मंगलवार को 22वीं पुण्यतिथि है। 24 मई 2000 को उनका निधन हुआ था।
मजरूह के नाम का इकलौता पार्क भी दुर्दशाग्रस्त
मजरूह सुलतानपुरी के नाम पर शहर के आफिसर्स कालोनी में पार्क बनाया गया है। यह पार्क नगर पालिका परिषद के अधीन है। यह पूरी तरह दुर्दशाग्रस्त है। मुख्य गेट पर लगा बोर्ड जमीन पर पड़ा है। चहारदीवारी टूट रही है। साफ-सफाई के अभाव में पार्क में झाड़ियां उगी हैं। वहीं, पैतृक गांव गजेहड़ी में खुला प्राइवेट स्कूल दशकों पहले बंद हो चुका है।
परिवार मुंबई में ही आबाद है। मजरूह और पं. राम किशोर त्रिपाठी के नाम पर जिला पंचायत में हर साल होने वाला मुशायरा, कवि सम्मेलन भी तीन साल से बंद है। नगरपालिका के अधिशासी अधिकारी श्यामेंद्र मोहन ने बताया कि पार्क के जीर्णोद्धार के लिए अमृत योजना के तहत कार्ययोजना बनाई जा रही है।
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