सदियों से कौतूहल का केंद्र है विजयगढ़ दुर्ग का तिलिस्म
रहस्यों से भरे जिले के ऐतिहासिक स्थल हमेशा से आकर्षण के केंद्र रहे हैं। इसमें से एक है जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर स्थित चंद्रकांता का तिलस्मी दुर्ग विजयगढ़।

जागरण संवाददाता, सोनभद्र : रहस्यों से भरे जिले के ऐतिहासिक स्थल हमेशा से आकर्षण के केंद्र रहे हैं। इसमें से एक है जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर स्थित चंद्रकांता का तिलस्मी दुर्ग विजयगढ़। देवकीनंदन खत्री कृत हिदी जगत के प्रथम उपन्यास चंद्रकांता ने इसे पूरे देश में प्रसिद्धि तो दिलाई ही नीरजा गुलेरी निर्देशित चंद्रकांता सीरियल ने रुपहले पर्दे पर ऐसी धाक जमाई कि इस दुर्ग का नाम और यहां का तिलस्म जन-जन की जुबां पर छा गया। सामान्यतया काशी नरेश चेत सिंह के काल का माना जाने वाला विजयगढ़ दुर्ग तिलस्मी है। चंद्रकांता धारावाहिक से ख्याति प्राप्त कर चुके इस तिलस्म दुर्ग की खासियत है कि दुर्ग के अंदर से गुफा के जरिए नौगढ़ और चुनार गढ़ किले के लिए रास्ता है। यह रास्ता तिलस्म से ही खुलता है। दुर्ग का खजाना भी इन्हीं गुफाओं में छिपे होने की संभावना अक्सर लोगों द्वारा जताई जाती है। दुर्ग के ऊपर बने छोटे-बड़े सात तालाब हैं। इनमें रामसरोवर तालाब और सीता तालाब में कभी पानी नहीं सूखता। यहां कांवरिये जल भरकर जलाभिषेक करने जाते हैं। सीता तालाब मीरानशाह बाबा के मजार के ठीक सामने है। किवदंतियां यह भी हैं कि पहले यहां लोग घूमने आते थे तो तालाब से बर्तन निकलता था। खाना खाने के बाद उसे धोकर लोग उसी तालाब में छोड़ देते थे। दुर्ग के पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार है, जो धराशाई हो रहा है। इसकी दीवारें गिर रही हैं। लोगों का कहना है कि जिस तरह से दीवारों का ढहना जारी है उससे कुछ दिनों में इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। दुर्ग के दक्षिण और पूर्व के कोने पर खिड़की का रास्ता है। ज्यादातर लोग इसी रास्ते से यहां पर जाते हैं, क्योंकि यह कम ऊंचा है। यहां कुछ सीढि़यां भी बनी हैं, लेकिन अधूरी हैं। जमीन से करीब पांच सौ मीटर ऊंचाई पर बने इस दुर्ग के अंदर जो कमरे बने थे वो खंडहर हो गए हैं। यहां दो यात्री शेड बना है उसी में रहते हैं। बारिश आंधी में लोग परेशान होते हैं। मीरान शाह बाबा की मजार और हनुमान मंदिर के पास छप्पर में लोग रुकते हैं। अब इस दुर्ग की पहचान बाबा मीरान शाह की मजार, हनुमान मंदिर और राम-सीता सरोवर तक ही सिमट कर रह गई है। वजह कि मजार पर साल भर में एक बार उर्स लगता है जिसमें हजारों जायरीन उमड़ते है।। पर्यटन की अपार संभावनाएं
हजारों साल पुराने, तिलस्म से भरपूर, आस्था, रहस्य व रोमांच के संगम स्थली विजयगढ़ दुर्ग पर पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। देखरेख के अभाव में यह ऐतिहासिक किला खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। यहां की सीढि़यों की मरम्मत कराकर, दुर्ग का सुंदरीकरण कराया जा सकता है। साथ ही यहां थोड़ी ही दूरी पर स्थित मऊ कला तक की सड़क को बेहतर तरीके से बनाकर पर्यटकों को वहां से जोड़ा सकता है। यहां शौचालय व पेयजल का भी व्यापक इंतजाम जरूरी है। यहीं उपजी थी चंद्रकांता उपन्यास की परिकल्पना
इतिहासकार डा. जितेंद्र कुमार सिंह संजय ने अपनी पुस्तक में बताया है कि हिदी साहित्यकार के प्रथम उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री का काशी नरेश ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह से बहुत अच्छा संबंध था। इसी संबंध के आधार पर खत्री को चकिया और नौगढ़ के जंगलों में बांस का ठेका मिल गया था। इस दौरान वे लगातार कई कई दिनों तक चकिया एवं नौगढ़ के बीहड़ जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों में घूमते रहते थे। कालांतर में जब उनसे जंगलों के ठेके छिन गए, तब इन्हीं जंगलों, पहाड़ियों और ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों में बैठकर कल्पनाओं को मिश्रित कर उन्होंने चंद्रकांता'''' (1888-1892 ई.) एवं चंद्रकांता संतति(1894-1904 ई.) नामक उपन्यास को लिखा था। वर्जन---
विजयगढ़ दुर्ग भारत सरकार की संपत्ति है। अब उसका देखरेख-संरक्षण भारतीय पुरातत्व विभाग के जिम्मे है। इसलिए पर्यटन विभाग चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता।
-अविनाश मिश्रा, संयुक्त निदेशक, पर्यटन।
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