सोनभद्र : ..'धनुर्विद्या' ही ऐसा खेल है जिसमें 'विद्या' शब्द जुड़ा है। यह कला हमारे देश की प्राचीन संस्कृति की विरासत है। इससे धन अर्जित भले न होता हो लेकिन अपने भारत की इसकी वजह से अलग पहचान तो स्थापित हो ही रही है। यह उद्गार पूर्व ओलंपियन कन्या गुरुकुल चोटीपुरा मेरठ की सुमंगला शर्मा के है। उन्होंने बताया कि 'अथर्वेद' का उपदेव 'धनुर्वेद' है। इसमें धनुष से छोड़े गए तीर की दस गतियों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। धनुर्विद्या की उत्पत्ति समय व स्थान निश्चित तौर पर ज्ञात तो नहीं है लेकिन ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार संभवत: यह विद्या भारत से ही यूनान व अरब देशों में पहुंची थी। नगर के राजा शारदा महेश इंटर कॉलेज में चल रही प्रदेशीय माध्यमिक विद्यालयीय तीरंदाजी प्रतियोगिता में विशिष्ट अतिथि के रूप में आई पूर्व ओलंपियन सुमंगला शर्मा ने 'जागरण' से कहा कि भारत वर्ष के दो प्रसिद्ध धर्मशास्त्रों 'रामायण' और 'महाभारत' में भारतीयों के धनुर्विद्या में पारंगता का वर्णन मिलता है। 'रघुवंशम्' में श्रीराम और श्री लक्ष्मण के धनुषों के टंकार का जहां वर्णन मिलता है वहीं अभिज्ञान शाकुंतलम् में दुष्यंत को धनुर्विद्या में निपुण बताया गया है। अग्निपुराण में इस विद्या की तकनीकी बारीकियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने बताया कि नीति प्रकाशिका में भी धनुष के लक्ष्य प्रति संधान, आकर्षण, विकर्षण, प्रत्याकर्षण, मंडलीकरण, पूरण और स्थारण आदि 14 चालों का वर्णन मिलता है।

सुमंगला की उपलब्धियां

ओलंपिक 2004 एथेन्स में 32 साल के बाद तीरंदाजी महिला टीम को छठवां स्थान मिला। 2004 में ही थाईलैंड ग्राण्ट फिक्स एशियन में टीम को कांस्य पदक मिला था। इसमें भारत की छह महिला तीरंदाज थी। इसी साल मलेशिया में महिला टीम को गोल्ड मेडल मिला था जिसमें गुरुकुल चोटीपुरा की तीन महिला तीरंदाज थी। 2005 में टर्की में महिला टीम सिलवर मेडल लाई थी। सुमंगला शर्मा ने यह भी बताया कि नेशनल स्तर पर तीन गोल्ड, दो सिल्वर और दो कांस्य पदक मिल चुका है। 2004 में ओलंपिक राउंड झारखंड के जेआरडी मैदान पर और 2005 में करेल, 2002 में हैदराबाद नेशनल खेल में मेडल मिला था। जूनियर एशियन चैम्पियनशिप में महिला टीम गोल्ड मेडल लाई थी। अपनी कामयाबी में आचार्य डॉ. सुमोधा एवं डॉ. सुकामा, कोच लक्ष्मी प्रिया और संसाधन उपलब्ध कराने वाले सुभाष गुप्त एवं अजय गुप्त के योगदान को वे अहम मानती हैं।

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