सामाजिक एकता से होती है समाज की जड़ मजबूत
सदियों से कायम परंपरा को बनाए रखना हम सब की जिम्मेदारी है। अफवाह के बल पर उन्मादी होना सभ्य समाज को कतई शोभा नहीं देता। इसलिए मानवता को सर्वोपरि स्थान देते हुए गलत लोगों का साथ कभी न दें। तभी सामाजिक एकता कायम रहेगी। हमारी पुरातन भारतीय संस्कृति और वेदों में कभी भी किसी के साथ किसी भी तरह के भेदभाव का वर्णन नहीं है।

शामली, जागरण टीम। सदियों से कायम परंपरा को बनाए रखना हम सब की जिम्मेदारी है। अफवाह के बल पर उन्मादी होना सभ्य समाज को कतई शोभा नहीं देता। इसलिए मानवता को सर्वोपरि स्थान देते हुए गलत लोगों का साथ कभी न दें। तभी सामाजिक एकता कायम रहेगी। हमारी पुरातन भारतीय संस्कृति और वेदों में कभी भी किसी के साथ किसी भी तरह के भेदभाव का वर्णन नहीं है। हमारे वेदों में तो केवल कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था बताई गई है। समय के साथ-साथ विकृतियां आती गई और जातिवाद, भेदभाव और छुआछूत आदि की प्रवृत्ति बढ़ती गई। उसके बाद अमीरी व गरीबी का जन्म हुआ और यह भेदभाव इतना बढ़ गया कि अमीर वर्ग गरीब लोगों को हीन भावना से देखने लगा। इन लोगों के छू लेने से इनके हाथ का पानी पीने से अमीर लोग अपना धर्म भ्रष्ट मानने लगे। इससे मन में कुंठा का भाव भी पैदा होता है और तब वह व्यक्ति अपनी सोच सीमित कर लेता है तथा समाज व देश के लिए कुछ नहीं कर पाता। हमारा मजदूर वर्ग यदि काम करना बंद कर देगा तो हमारे देश की उन्नति का पहिया रुक ही जाएगा, क्योंकि प्रत्येक कार्य स्वयं नहीं कर सकते, इसके लिए हमें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। हमारे शरीर के सभी अंग स्वतंत्र हैं। सभी का अपना-अपना अस्तित्व भी है। जब शरीर के सभी अंग मिलकर काम करते है तो शरीर सुचारू रूप चलता है। एक व्यापारी भी तभी फलता-फूलता है जब सभी वर्ग एक दूसरे से जुड़ रहें। उसी प्रकार हमारा समाज और देश है। यदि सभी वर्ग शांतिपूर्वक मिलकर एकजुट होकर चलें तो हमारे समाज की जड़ मजबूत हो जाएगी। अनेक वर्षो से हमारे संत, मुनि, समाज सुधारक और कई समाजसेवी संस्थाएं देश को एकता व समरसता के धागे में पिरोने का काम कर रही हैं। जैसे महात्मा गांधी ने अफ्रीका में काले व गोरे का भेद खत्म किया था। डा. भीमराव अंबेडकर ने इसे संवैधानिक रूप दिया, जिससे समाज में समानता लाने में सफलता मिली। हमारे बड़े-बुजुर्गो को नई पीढ़ी को प्रेम व आपसी भाईचारे की शिक्षा बचपन से ही देनी होगी। समरसता का अर्थ ही समाज को एकजुट करना और पारस्परिक भेदभाव को समाप्त करना है। यह कार्य सामूहिक रूप से ही संभव है। लोगों के जागरूक होने की जरूरत है, तभी इस बुराई का अंत हो सकता है। समाज में एकता और समरसता का भाव तभी पैदा होगा, जब सभी शिक्षित होने के साथ-साथ जागरूक होंगे। ऐसे में शिक्षा और जागरूकता से सामाजिक एकता के लक्ष्य को पाया जा सकता है।
-विनोद कुमार वर्मा, प्रधानाचार्य देशभक्त इंटर कालेज शामली
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