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    रामपुर के अफसरों की अच्छी सोच का परिणाम, जो खड़े भी नहीं हो पाते थे वे अब दौड़ने लगे

    Rampur Officers Great Job for Disabled Children जहां चाह वहां राह। दिव्यांग बच्चों को पूरी तरह ठीक करने के लिए अफसरों ने जो कमर कसी उसका सुपरिणाम अब सबके सामने है। जिले के अफसर ऐसे बच्चों की सर्जरी करवाकर उनकी दिव्यांगता पूरी तरह दूर करा रहे हैं।

    By Mohd MuslemeenEdited By: Samanvay PandeyUpdated: Mon, 07 Nov 2022 01:41 PM (IST)
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    Rampur Officers Great Job for Disabled Children : photo jagran

    रामपुर, (मुस्लेमीन)। Rampur Officers Great Job for Disabled Children : जहां चाह वहां राह। दिव्यांग बच्चों को पूरी तरह ठीक करने के लिए अफसरों ने जो कमर कसी, उसका सुपरिणाम अब सबके सामने है। जिले के अफसर ऐसे बच्चों की सर्जरी करवाकर उनकी दिव्यांगता पूरी तरह दूर करा रहे हैं। जो बच्चे पहले खड़े भी नहीं हो पाते थे, अब वे दौड़ने लगे हैं। अब तक 29 बच्चों की सर्जरी हो चुकी है, 33 और बच्चे भी चिह्नित कर लिए गए हैं।

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    कोरोना काल में बना बाल कोष

    दो साल पहले कोरोना काल में रामपुर जिले के अफसरों ने गरीब और लाचार बच्चों की मदद के लिए बाल कोष (डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड केयर एंड प्रोटेक्शन फंड) बनाया था। तत्कालीन जिलाधिकारी (वर्तमान में मंडलायुक्त मुरादाबाद) आन्जनेय कुमार सिंह समेत तमाम अफसरों ने इसमें बढ़-चढ़कर आर्थिक सहयोग किया।

    अफसरों के साथ परिचितों ने किया सहयोग

    अपने परिचितों और कारोबारियों से भी इसमें योगदान करवाया। इस कोष में अब तक 80 लाख रुपये जमा हो चुके हैं। समिति का बैंक में खाता खोला गया है, इसमें 100 से ज्यादा अफसर पैसा जमा कर चुके हैं। मंडलायुक्त ने इसमें 10 हजार रुपये जमा कर इसकी शुरुआत की थी।

    बाल कोष के लिए बनी है जिला स्तरीय समिति

    उनकी पत्नी गरिमा सिंह ने भी इतनी ही रकम जमा की थी। बाल कोष के लिए जिला स्तरीय समिति बनी है, डीएम इसके अध्यक्ष और सीडीओ सचिव हैं। अपर जिलाधिकारी और सभी उप जिलाधिकारी सदस्य हैं। समिति ने सबसे पहले सर्वे कराकर गरीब बच्चों को चिह्नित किया, फिर मदद की गई। इस कार्य को मिशन मुस्कान का नाम दिया गया।

    अब मिशन समर्थ

    जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड़ बताते हैं कि अब मिशन समर्थ चल रहा है। इसके माध्यम से हम दिव्यांग बच्चों की सर्जरी कराकर उनकी दिव्यांग्ता पूरी तरह दूर कराना चाहते हैं। जिन बच्चों की सर्जरी के माध्यम से दिव्यांगता दूर हो सकती है, उनके आपरेशन कराए जा रहे हैं। इनकी दिव्यांगता दूर होने से दो फायदे होंगे। एक तो वे पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगे, दूसरे सरकार का भी दिव्यांग पेंशन पर खर्च होने वाला धन बच सकेगा।

    सुधर गई बेटे की जिंदगी

    चमरौआ ब्लाक के पसियापुरा जुनूबी गांव के जाने आलम के दो वर्षीय पुत्र अली हसन की भी सर्जरी कराई गई है। जाने आलम बताते हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। उन्हें बाल कोष के बारे में पता चला तो जिलाधिकारी से मदद की गुहार लगाई। उनका बेटा पैर तिरछा होने का कारण चल नहीं पा रहा था, 18 अप्रैल को उसकी सर्जरी हुई। अब वह चलने लगा है। प्रशासन ने हमारी जो मदद की है, उससे हमारे बेटे की जिंदगी सुधर गई है। इससे हम बहुत खुश हैं।

    सर्जरी के लिए 62 बच्चे चिह्नित

    बाल कोष के उपसचिव एवं कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे जिला कार्यक्रम अधिकारी राजेश कुमार बताते हैं कि सर्जरी के लिए 62 बच्चे चिह्नित किए गए। इनमें 29 की सर्जरी हो चुकी है। पहले ये ठीक से चल भी नहीं पाते थे। कुछ तो खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। इनके परिवार की आर्थिक स्थिति सर्जरी कराने लायक नहीं थी।

    सबसे पहले अप्रैल में पांच बच्चों की हुई सर्जरी

    सबसे पहले अप्रैल माह में पांच बच्चों की सर्जरी कराई गई। इनके बाद 24 और बच्चों की सर्जरी हुई। इनमें अली हसन, आरूषि, सेबी, फरहान, रेहान, प्रियांशु, उज्जवल, आरती, विक्की, प्रिंस, सुमित, अलका, काव्या, कार्तिक, वासु, जुनैद, समीर आदि शामिल हैं। इन सबकी सर्जरी पर 10 लाख रुपये खर्च हुए हैं। सर्जरी टीएमयू मुरादाबाद के अस्पताल में डा. जीएल अरोड़ा कर रहे हैं।

    पैरों से नहीं, अब हाथ से लिखेगा वसीम

    घाटमपुर कम्पोजिट प्राथमिक विद्यालय के छात्र वसीम के दोनों हाथ करंट लगने के बाद कट गए थे, लेकिन उसका हौंसला कम नहीं हुआ है। वह पैरों से लिखता है और खेलकूद प्रतियोगिताओं में भी भाग लेता है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वह मुंह से तिरंगा झंडा लहराते हुए गांधी समाधि पहुंचा तो उसके जज्बे को देख जिलाधिकारी समेत अन्य अधिकारी हतप्रभ रह गए। डीएम ने उसकी मदद करने की ठान ली।

    दिल्ली की कंपनी उपलब्ध कराती है उपकरण 

    अधिकारियों के साथ ही ऐसी कई कंपनियों से बात की, जो हाथ-पैर लगाने का काम करती हैं। लाजपतनगर दिल्ली की कंपनी पी एंड ओ इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटे़ड से छह लाख में बात तय हो गई। तीन लाख रुपये एडवांस में दे दिए गए हैं। वसीम के हाथों को रोबोटिक्स के जरिए चलाया जाएगा, जो सेंसर सिस्टम के जरिए दिमाग से जुड़े होंगे।