मो. कैफ की नगरी में क्रिकेट स्टेडियम की आस, कब तक कानपुर-दिल्ली भटकते रहेंगे संगम नगरी के होनहार?
प्रयागराज में स्तरीय क्रिकेट स्टेडियम के अभाव से युवा प्रतिभाएं कानपुर-दिल्ली पलायन कर रही हैं। बीसीसीआई ने 2019 से घरेलू ...और पढ़ें

प्रयागराज के मदन मोहन मालवीय स्टेडियम का मैदान।-जागरण
HighLights
एक दौर में यूपी रणजी टीम में प्रयागराज के 8 खिलाड़ी मैदान संभालते थे
अब यहां के होनहार खिलाड़ी आज एक अदद स्तरीय पिच के लिए तरस रहे
मानक स्टेडियम न होने से BCCI ने घरेलू बोर्ड ट्राफी मैचों की मेजबानी छीनी
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। जिस संगम की माटी ने देश को मोहम्मद कैफ जैसा जांबाज क्रिकेटर दिया और जहां से एक दौर में यूपी रणजी टीम में आठ-आठ खिलाड़ी एक साथ मैदान संभालते थे, उसी प्रयागराज के होनहार आज एक अदद स्तरीय पिच को तरस रहे हैं। शहर में अंतरराष्ट्रीय और प्रथम श्रेणी क्रिकेट स्टेडियम की मांग 90 के दशक से कागजों, सरकारी फाइलों और चुनावी वादों में उलझी है।
गावस्कर भी यहां खेल चुके हैं
1987 में सुनील गावस्कर जैसे भारतीय टीम के खिलाड़ी यहां खेले और यह अब सिर्फ याद में है। मानक स्टेडियम न होने से 2019 से बीसीसीआई ने प्रयागराज से घरेलू बोर्ड ट्राफी मैचों की मेजबानी छीन ली है। पहले मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में मुकाबले होते थे, लेकिन वहां सिंथेटिक एथलेटिक्स ट्रैक बिछने के बाद मैदान क्रिकेट के लायक नहीं बचा।

दावे तो हुए पर नतीजा नहीं निकला
बमरौली, फाफामऊ, सोरांव से लेकर यमुनापार तक जमीन तलाशने के दावे हुए, मगर नतीजा सिफर रहा। मजबूरी में प्रतिभाएं कानपुर, लखनऊ और दिल्ली पलायन कर रही हैं। जो खर्च नहीं उठा पा रहे, उनका हुनर यहीं दम तोड़ रहा है।

क्या कहते हैं खिलाड़ी?
हमने बोर्ड ट्राफी खेली है, हमें पता है कि बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए टर्फ पिच और बड़े मैदान का क्या मोल है। प्रयागराज में प्रतिभा की कमी नहीं, लेकिन सही मंच न मिलने से लड़के पिछड़ रहे हैं।'
- रंग राजन द्विवेदी (अंडर-19 बोर्ड ट्राफी खिलाड़ी एवं एजी आफिस कर्मी)
हम अकादमियों में बच्चों को तैयार तो कर रहे हैं, पर उन्हें मैच एक्सपोजर देने के लिए कानपुर-दिल्ली भेजना पड़ता है। हर परिवार यह खर्च नहीं उठा सकता। शहर में स्टेडियम न होना खेल के साथ अन्याय है।
- हृदय नारायण पांडेय (कोच, श्री सहायक क्रिकेट अकादमी)
विश्वविद्यालय स्तर से आगे निकलने के बाद खिलाड़ियों को प्रथम श्रेणी का बुनियादी ढांचा चाहिए होता है। 37 साल का इंतजार किसी भी खेल संस्कृति को खत्म करने के लिए काफी है। अब ठोस कदम उठाने ही होंगे।
- अमर चौधरी (पूर्व कप्तान, यूनिवर्सिटी इंडिया टीम,एजीयूपी)
जब तक शहर में बीसीसीआई के मानक वाला मैदान नहीं होगा, तब तक हमारे लड़के सीधे चयनकर्ताओं की नजर में नहीं आएंगे। बड़े मैचों की मेजबानी छिनने का सबसे बड़ा नुकसान युवा पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है।
- अमर काला (पूर्व खिलाड़ी, रेलवे अंडर-23 व यूपीसीए अंडर-19, एजीयूपी)

क्या मिले तो प्रयागराज में लौटेगा क्रिकेट
- ऐसा स्टेडियम जहां पिच के केंद्र से बाउंड्री की दूरी न्यूनतम 65 से 75 गज (लगभग 60 से 68 मीटर) हो।
- पांच से सात मुख्य टर्फ पिचें, घास वाली सघन आउटफील्ड और सब-एयर ड्रेनेज सिस्टम ।
- दो बड़े ड्रेसिंग रूम, मैच रेफरी व अंपायर रूम, डोप टेस्टिंग रूम और फिजियोथेरेपी कक्ष।
- कमेंट्री बाक्स, प्रेस गैलरी, ब्राडकास्ट प्लेटफार्म, थर्ड अंपायर सेटअप और डिजिटल स्कोरबोर्ड।
- सुरक्षा घेरा, पर्यादर्शक दीर्घा, नेट एरिया और आपातकालीन मेडिकल सुविधा।
