भारतीय वायु सेना: ऑपरेशन सफेद सागर से बालाकोट स्ट्राइक तक, CAC के पायलटों के अदम्य साहस की गाथा
प्रयागराज स्थित मध्य वायु कमान (सीएसी) देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जहाँ पायलटों को रडार से बचने ...और पढ़ें

बमरौली स्थित मध्य कमान में वायु सैनिकों के प्रशिक्षण के बाद एक पुरानी ग्रुप फोटो। सौ. पीआरओ
HighLights
मध्य वायु कमान का मुख्यालय 1966 में बमरौली स्थानांतरित हुआ।
पायलटों को रडार से बचने और रात में उड़ान का प्रशिक्षण मिलता है।
कारगिल, बालाकोट जैसे अभियानों में अदम्य साहस का प्रदर्शन।
अमरीष मनीष शुक्ला, प्रयागराज। जब सीमा पर तनाव हो या उत्तर व मध्य भारत के विशाल आसमान पर निगहबानी की बात आए, तो देश की सुरक्षा की सबसे मजबूत धुरी बनकर सामने आती है प्रयागराज (बमरौली) स्थित मध्य वायु कमान (सीएसी)। आज आठ अक्टूबर को जब देश भर में वायु सेना दिवस मनाया जा रहा है उस समय भी यहां सिर्फ रणनीतिक योजनाएं ही नहीं बन रही, बल्कि भारतीय वायु सेना के लिए रणभूमि के जांबाज 'लड़ाके' भी तराशे जा रहे हैं।
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद उत्तरी सीमाओं की हवाई सुरक्षा चाक-चौबंद करने के लिए 10 जून 1963 को रानीखेत में मध्य कमान की नींव रखी गई थी। 1911 में दुनिया की पहली आधिकारिक डाक उड़ान और 1920-30 के दशक में स्थापित बमरौली देश के सबसे पुराने व पक्के रनवे वाले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों में शुमार हो चुका था। भौगोलिक केंद्र में स्थिति, बेहतरीन कनेक्टिविटी और बमरौली के स्थापित एविएशन इन्फ्रास्ट्रक्चर के चलते फरवरी 1966 में मुख्यालय को यहां स्थानांतरित किया गया।
पायलटों को रणक्षेत्र के लिए ढालने वाली नर्सरी
'दमनीयाः आत्मशत्रवः' (शत्रुओं का दमन करना) के ध्येय वाक्य के साथ संचालित बमरौली एयरबेस पायलटों को रणक्षेत्र के लिए ढालने वाली प्रमुख नर्सरी है। बमरौली में तैयार यही जांबाज ग्वालियर के मिराज-2000, बरेली के सुखोई-30 एमकेआई और गोरखपुर के जगुआर जैसे अग्रिम बेड़ों के साथ मिलकर देश का सुरक्षा चक्र मजबूत करते हैं।
1971 के युद्ध, 1999 के कारगिल संघर्ष (ऑपरेशन सफेद सागर) में बर्फीली चोटियों पर सटीक लेजर-गाइडेड बमबारी, 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक और 2013 की केदारनाथ आपदा (ऑपरेशन राहत) में जिंदगी बचाने वाले पायलटों के अदम्य साहस की जड़ें इसी कमान के प्रशिक्षण से जुड़ी रही हैं।
मध्य कमान में क्या है खास?
बमरौली बेस नव-प्रशिक्षित फाइटर व रोटरी-विंग पायलटों को स्वदेशी एडवांस्ड लाइट हेलीकाप्टर 'ध्रुव' और 'चेतक' जैसे हल्के विमानों पर घातक सामरिक युद्धाभ्यास कराया जाता है। हेलीकाप्टर कांबैट ट्रेनिंग (111 हेलीकाप्टर यूनिट) इसकी पहचान है।
युद्ध के समय दुश्मन के रडार से बचकर नीचे उड़ान भरने और रात के घने अंधेरे में नाइट विजन गागल्स के साथ सटीक हमले की कठिन ट्रेनिंग यहीं दी जाती है। सियाचिन और हिमालयी अग्रिम चौकियों पर रसद पहुंचाने, घायल जवानों को एयरलिफ्ट करने और कठिन लैंडिंग का अभ्यास बमरौली के प्रशिक्षक पायलटों को कराते हैं।
अत्याधुनिक सिम्युलेटर तकनीक और 24 घंटे आपरेशंस रूम के जरिए पायलटों को इलेक्ट्रानिक वारफेयर, मिसाइल से बचाव और रडार डाजिंग के गुर सिखाए जाते हैं।
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