हिंद महासागर के बदलते संबंध से भारतीय मानसून पूर्वानुमान में चुनौती, एआई हाइब्रिड मॉडल विकसित करने की जरूरत
हिंद महासागर के बदलते मिजाज से भारतीय मानसून की भविष्यवाणी की सटीकता प्रभावित हो रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।
HighLights
हिंद महासागर-मानसून संबंध 1985 के बाद काफी बदला।
अलनीनो, इंडियन ओशन डायपोल भी मानसून प्रभावित करते हैं।
सटीक पूर्वानुमान हेतु एआई हाइब्रिड मॉडल की आवश्यकता।
मृत्युंजय मिश्र, प्रयागराज। समुद्र का तापमान बढ़ने पर भारत में अच्छी बारिश होगी या कम, मौसम वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे संकेतों के आधार पर मानसून का अनुमान लगाते रहे हैं। लेकिन अब समुद्र के पुराने संकेत पहले की तरह भरोसेमंद नहीं रह गए हैं। जिस समुद्री स्थिति का संबंध कभी कम बारिश से था, उसी का संबंध बाद के वर्षों में अधिक बारिश से जुड़ गया।
हाल के दशकों में संबंध फिर कमजोर पड़ने से भविष्यवाणी करने वाले मौजूदा माडलों के सामने सटीकता की चुनौती है। इसको देखते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वायुमंडलीय एवं महासागर अध्ययन केंद्र के प्रो. सुनीत द्विवेदी, आलोक मिश्रा, सफल सक्सेना और उनकी टीम ने वर्ष 1901 से 2023 तक के 123 वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन किया। पता चला कि 1985 के आसपास हिंद महासागर के तापमान और भारतीय मानसून के बीच संबंध ने बड़ी करवट ली।
भारत में मानसूनी बारिश पर असर
प्रो. सुनीत द्विवेदी के अनुसार, मानसून का पूर्वानुमान केवल समुद्र के तापमान से नहीं लगाया जा सकता। प्रशांत महासागर में अलनीनो और हिंद महासागर में इंडियन ओशन डायपोल जैसी घटनाएं भी बारिश को प्रभावित करती हैं। प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र का तापमान बढ़ने से अलनीनो की स्थिति बन सकती है, जिसका असर भारत में मानसूनी बारिश पर पड़ता है।
वहीं, हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के तापमान में अंतर को इंडियन ओशन डायपोल कहते हैं। सामान्यतः इसके सकारात्मक चरण में भारत में अच्छी बारिश की संभावना मानी जाती है। शोध के मुताबिक, 1968 से 1982 के दौरान हिंद महासागर के तापमान में बदलाव और मध्य भारत की बारिश के बीच नकारात्मक संबंध था।
यानी समुद्र के तापमान में बदलाव का संबंध मध्य भारत में कम बारिश से था, लेकिन 1985 के आसपास यह संबंध नकारात्मक से सकारात्मक हो गया। वर्ष 1992 से 2006 के दौरान इसी तरह के समुद्री बदलाव अधिक बारिश से जुड़े मिले।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल क्लाइमेट डायनमिक्स में प्रकाशित शोध
अब हाल के दशकों में हिंद महासागर और मानसूनी बारिश के बीच यह संबंध फिर कमजोर पड़ गया है, जो कम बारिश की ओर संकेत करता है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल क्लाइमेट डायनमिक्स में प्रकाशित हुआ है।
प्रो. सुनीत कहते हैं कि मानसून के विभिन्न कारकों के परस्पर संबंधों को समझना जरूरी है। ऐसा नहीं होने से पूर्वानुमान की सटीकता प्रभावित होगी। अलनीनो, इंडियन ओशन डायपोल, हवाओं की दिशा और नमी के बीच बदलते संबंधों को नए सिरे से समझना जरूरी है। इसके लिए पूर्वानुमान माडलों को इन बदलावों को ध्यान में रखते हुए अपडेट करने के साथ एआइ आधारित हाइब्रिड माडल विकसित करने की जरूरत है।
