प्रयागराज हाईटेक सिटी में 67 हजार वर्ग मीटर जमीन पर सरकार का दावा खारिज, हाई कोर्ट में प्रदेश सरकार को झटका
हाईटेक सिटी प्रयागराज के नाम दर्ज भूमि को लेकर विवाद में राज्य सरकार को इलाहाबाद हाई कोर्ट में झटका लगा है। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और जस्टिस विपिन चंद्र दीक्षित की खंडपीठ ने करछना तहसील में 67138.12 वर्ग मीटर जमीन पर सरकार का दावा खारिज करते हुए आठ सप्ताह में याचीगण के पक्ष में राजस्व दस्तावेज दुरूस्त करने का आदेश दिया है।

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। हाईटेक सिटी प्रयागराज के नाम दर्ज भूमि को लेकर विवाद में राज्य सरकार को इलाहाबाद हाई कोर्ट में झटका लगा है। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और जस्टिस विपिन चंद्र दीक्षित की खंडपीठ ने करछना तहसील में 67,138.12 वर्ग मीटर जमीन पर सरकार का दावा खारिज करते हुए आठ सप्ताह में याचीगण के पक्ष में राजस्व दस्तावेज दुरूस्त करने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने कहा,याचिका वर्ष 2016 में दायर की गई है राज्य द्वारा कथित रूप से कब्जा लेने के 20 वर्ष बाद। इससे साफ है कि भूमि पर तब तक याची का कब्जा था। यदि विवादित तथ्यों का पता लगाया जा सके तो रिट कोर्ट अधिशेष भूमि पर वास्तविक कब्जे के सवाल पर विचार कर सकता है। अनुच्छेद 226 के तहत दायर इस याचिका में याचीगण ने भूमि से बेदखल किए जाने अथवा शांतिपूर्ण कब्जे में हस्तक्षेप से रोकने के लिए परमादेश जारी करने की प्रार्थना की थी।
संबंधित प्रकरण में राज्य यह स्थापित नहीं कर सका कि भूमि का वास्तविक कब्जा शहरी भूमि (सीलिंग और विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 के अधिनियमन से पहले लिया गया था। याची राम जी व अन्य के पिता,ससुर व दादा भोलानाथ के पास लवायन कला गांव अरैल में कृषि भूमि थी। खाली भूमि को लेकर भोलानाथ के खिलाफ शहरी भूमि (सीलिंग और विनियमन) अधिनियम, 1976 की धारा 6 (1) के तहत कार्यवाही शुरू की गई तथा 1983 में उनके खिलाफ एकपक्षीय आदेश पारित किया गया। इसके अंतर्गत 67,138.12 वर्ग मीटर जमीन अधिशेष घोषित की गई।
सीलिंग एक्ट की धारा 10 के तहत कार्यवाही शुरू करते हुए और भोलानाथ को अधिशेष जमीन सरेंडर करने के लिए 30 दिन का समय दिया गया। इसके बावजूद न तो भोलानाथ ने जमीन सरेंडर किया और न ही अधिकारी कब्जा ले सके। वर्ष 2005 में मृत्यु तक भोलानाथ का कब्जा रहा। उसके बाद उत्तराधिकारी काबिज रहे। शहरी भूमि (सीलिंग और विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 के आधार पर 2015 में अधिकारियों ने याचीगण को 30 दिनों के भीतर अधिशेष भूमि खाली करने का निर्देश देते हुए कहा कि ऐसा नहीं होने पर उन्हें जबरन बेदखल कर दिया जाएगा।
हाई कोर्ट में याचीगण ने बेदखली से सुरक्षा मांगी। खंडपीठ ने माना कि राज्य यह साबित करने में विफल रहा है कि अधिशेष भूमि पर उसका कब्ज़ा था। कोर्ट ने कहा, एक सरकारी आदेश से संकेत मिलता है कि राज्य सरकार ने 1996 में प्रयागराज विकास प्राधिकरण को भूमि हस्तांतरित कर दी थी, परंतु बलपूर्वक बेदखली या मुआवज़े का कोई नोटिस रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया।
याचीगण ने 1422 फसली वर्ष (वर्ष 2012 ) का खसरा दिखाया, जिसमें रामजी और उनके कानूनी उत्तराधिकारियों के नाम जमीन थी। जवाबी हलफनामे में प्रतिवादियों ने फसली वर्ष 1426-1431 (वर्ष 2016-2021) की खतौनी पेश की, जिसमें राज्य का नाम है। फसली वर्ष 1414-1419 (वर्ष 2004-2009 के अनुरूप) की खतौनी भी रिकॉर्ड में लाई गई जिसमें जमीन हाई टेक टाउनशिप के नाम दर्ज है।
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