दुष्यंत कुमार में था कलम के जरिए सत्ता से टकराने का माद्दा, UP में इस जगह पके उनके साहित्यिक विचार
दुष्यंत कुमार जिन्हें सत्ता और समाज के मार्गदर्शन के लिए जाना जाता है प्रयागराज में शिक्षा प्राप्त करने आए थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उन्होंने साहित्यिक मित्रों के साथ अपने विचारों को विकसित किया। छात्रावास के कमरा नंबर 87 ने उनके क्रांतिकारी विचारों को आकार दिया। साहित्यकारों की संगति ने उन्हें ऊर्जा और ओजस्विता दी जिससे वे साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज । साहित्यकार दुष्यंत कुमार का नाम सत्ता और समाज के मार्गदर्शन में बड़े सम्मान से लिया जाता है। उन्हें उनके पिता भगवत सहाय ने बिजनौर से इलाहाबाद (अब प्रयागराज) भेजा था, ताकि वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर डिप्टी कलेक्टर बन सकें। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उनके सहपाठी मार्कंडेय और कथाकार कमलेश्वर बने।
गजल और काव्य रचनाओं के बीच उन्होंने लिखा, "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं- मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए, मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही- हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए," और इस प्रकार वे साहित्य जगत के सितारे बन गए।
एक सितंबर 1933 को बिजनौर में जन्मे दुष्यंत कुमार को इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि उनमें कलम के जरिए सत्ता से टकराने का माद्दा था। उनके विचारों को क्रांतिकारी बनाने का श्रेय पीसी बनर्जी छात्रावास के कक्ष संख्या 87 को जाता है।
इसी कमरे में उन्होंने दिया साहित्यिक विचारों को विस्तार
इसी कमरे में रहकर उन्होंने साहित्यिक विचारों को विस्तार दिया। साहित्यकार रविनंदन सिंह बताते हैं कि बीए की पढ़ाई के दौरान दुष्यंत कुमार साहित्यिक विचारों में रमने लगे थे। उस समय वे 'परदेसी' उपनाम से कविताएं लिखते थे।
कवि रामनाथ अवस्थी और बलवीर सिंह 'रंग' के साथ उनका प्रारंभिक उठना-बैठना था। बाद में कमलेश्वर और मार्कंडेय से मित्रता हो गई। इन तीनों को त्रिशूल नाम से प्रसिद्धि मिली। दुष्यंत कुमार गोष्ठियों में भाग लेने लगे और साहित्यिक खेमेबंदी में कभी नहीं उलझे।
साहित्यकारों की संगति से दुष्यंत को मिली ऊर्जस्विता और ओजस्विता
संस्था सर्जनपीठ ने दुष्यंत कुमार त्यागी की जन्मतिथि से एक दिन पहले रविवार को 'दुष्यंत कुमार के साहित्य का वर्तमान' विषय पर एक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद वर्चुअल किया। इस परिसंवाद में मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया के हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. जैनेंद्र कुमार पांडेय ने कहा कि गजल, साहित्य की कोमल विधा है।
दुष्यंत कुमार की हिंदी गजलें अपना स्तर बदलती हैं। वारणा विश्वविद्यालय के प्रो. प्रकाश चिकुर्डेकर ने कहा कि दुष्यंत कुमार का रचना-संसार आज भी समय का जीवंत दर्शन कराता है। शासकीय ठाकुर रणमत सिंह उत्कृष्टता महाविद्यालय के प्रो. महेश शुक्ल ने कहा कि उनकी कविताओं में जीवन की सच्चाई और सामाजिक संवेदना की झलक मिलती है।
परिसंवाद के आयोजक व्याकरणवेत्ता और भाषाविज्ञानी आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पांडेय ने कहा कि जिस किसी व्यक्ति ने इलाहाबाद को अपनी कर्मभूमि बनाकर साहित्य-साधना की है, वह एक उज्ज्वल नक्षत्र के रूप में चमकता रहा। दुष्यंत नारायण त्यागी भी इसके अपवाद न रहे।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक की शिक्षा ग्रहण की
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक की शिक्षा ग्रहण की, तब सर प्रमदाचरण बनर्जी छात्रावास के कक्ष संख्या 87 में रहते थे। रमानाथ अवस्थी, मार्कंडेय, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव आदि साहित्यकारों की संगति ने उन्हें साहित्य की ऊर्जस्विता और ओजस्विता दी।
जीवन तो उनका केवल 44 साल रहा लेकिन साहित्य संसार को यह कहते हुए जो दे गये, यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए', वह दुर्लभ है।' रांची झारखंड से वर्चुअल परिसंवाद में जुड़े मनोज कुमार झा, आकाशवाणी इलाहाबाद की वंदना राठौर, अलीगढ़ की डा. कनुप्रिया प्रचंडिया ने भी विचार व्यक्त किए।
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