इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकीलों को पैरवी से जबरन रोका, महिला अधिवक्ता से दुर्व्यवहार
इलाहाबाद हाई कोर्ट में अदालती कार्यवाही बाधित हुई, जहां साथी अधिवक्ताओं को मुकदमों की पैरवी से जबरन रोका गया और ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट। जागरण
HighLights
हाई कोर्ट में अदालती कार्यवाही बाधित, वकीलों को रोका गया।
महिला अधिवक्ता के साथ दुर्व्यवहार, कोर्ट ने संज्ञान लिया।
न्यायमूर्ति ने बार-बेंच की गरिमा पर चिंता जताई।
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट में अदालती कार्यवाही बाधित की गई। साथी अधिवक्ताओं को मुकदमों में पैरवी से जबरन रोकने की कोशिश की गई। एक महिला अधिवक्ता को कोर्ट रूम में आने से रोकने और उनके साथ दुर्व्यवहार की घटना भी सामने आई। उनकी चीख-पुकार भी कोर्ट को सुनाई दी।
न्यायमूर्ति ने इसे बार और बेंच की गरिमा के प्रतिकूल बताते हुए युवा वकीलों को इंटरनेट मीडिया पर लाइक बटोरने के बजाय कानून की पढ़ाई और मुकदमों की तैयारी पर ध्यान देने की नसीहत दी। कोर्ट ने चेताया कि अधिवक्ताओं के ऐसे आचरण से न्यायपालिका और बार पर जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि किसी वर्ग विशेष के विरोध या बहिष्कार के नाम पर न्यायिक कामकाज ठप नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने शुक्रवार को एक जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अब यह मामला 26 नवंबर को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया है। शुक्रवार को कोर्ट नंबर 66 में मामले को शीघ्र सुनवाई के लिए जमानत की एक याचिका सूचीबद्ध थी। सूची संशोधित होने और दोबारा पुकार के बावजूद आवेदक की ओर से कोई पैरवी करने नहीं आया।
कोर्ट के संज्ञान में आया कि आवेदक के अधिवक्ताओं को कुछ वकीलों ने जबरन रोक दिया था। सरकारी वकीलों को भी जबरन अदालत से बाहर कर दिया गया। एक महिला अधिवक्ता की चीख-पुकार भी कोर्ट ने सुनी। वह अपने मामले में पेश होने के लिए कोर्ट रूम में आना चाहती थीं, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उन्हें जबरन रोका गया। कोर्ट ने कहा ऐसा आचरण बार और बेंच, दोनों की प्रतिष्ठा और गरिमा के अनुकूल नहीं है।
अधिवक्ताओं का एक वर्ग कोर्ट नहीं चलने देना चाहता, लेकिन इस आधार पर अदालती कार्यवाही नहीं रोकी जा सकती, खासकर जब अधिकांश अधिवक्ता अपने मुकदमों में बहस करना चाहते हैं। कोर्ट ने कुछ युवा अधिवक्ताओं की हाई कोर्ट और वकीलों के कामकाज पर इंटरनेट मीडिया में डाली गई पोस्ट का भी न्यायिक संज्ञान लिया। कहा-अधूरी और तोड़-मरोड़कर पेश की गई सूचनाएं बार और बेंच के बीच मतभेदों को अनावश्यक रूप से बढ़ा सकती हैं।
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जनता का भरोसा कमजोर होने पर माफिया और कुछ बेलगाम सरकारी अधिकारी वकीलों का उत्पीड़न कर सकते हैं, जैसा हाल में कुछ जिलों में हुआ और कई अखबारों ने उजागर किया। सरकारी अधिवक्ता भी अधिवक्ता हैं और गरिमा में निजी तथा सरकारी, दोनों तरह के वकील शामिल हैं। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि हाई कोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी इस मुद्दे पर विचार कर उचित कदम उठाएगी।
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